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________________ धर्मः | ईयणा / अन्ना य गुणावि ते समेंति जहा // कम्मजराईथुश्मा-श्यावि तह नावस्यणा / / का // 3 // इति श्लोकनावार्थः // 1 // श्रथ सा पूजा कतिविधेति दर्शयन्नाद .... // मूलम् ।।-चारुपुष्पामिषस्तो त्रै–त्रिविधा जिनपूजना // पुष्पगंधादिनिश्चान्यै-रष्टधेयं | निगद्यते // 1 // व्याख्या-चांरुपुष्पामिषस्तोत्रैरिति, चारूणि प्रधानानि पुष्पाणि कुसुमानि, था. मिषानि नैवेद्यानि, स्तोत्राणि स्तवनानि, तैश्चारुपुष्पामिषस्तो स्त्रिविधा त्रिप्रकारा जिनपूजा जि| नार्चना पुष्पगंधादिभिः कुसुमवासादिभिः, श्रादिशब्दाधूपदीपादातादिग्रहः, चः समुच्चये, अन्यैरप रैराचार्यैरष्टधाष्टप्रकारेयमेषा निगद्यते कथ्यते इति श्लोकार्थः // 1 // अथाष्टविधत्वमेवास्याः सहटांतं श्लोकदशकेनाह.. // मूलम् ॥–शुनैः सुगंधिनिः पुष्पै-यः कुरुते जिनार्चनं / स प्राप्नोति समं कोल् / र. लचंद्र व श्रियः // 1 // पुटपाकादिनिर्गधैर्येयंति जिनेश्वरं // बनते तेऽचिरात्सिहिं / र लसुंदरवज्जनाः // 2 // धूपं दहति यः सारं / जावसारं जिनाग्रतः / स याति लब्धसर्वईि-न। रकेसखिचिवं // 3 / / प्रदीपयति यो चक्क्या / प्रदीपं जिनमंदिरे // स हि स्यादखिलश्रीणां / ना. P.P.AC.Gunratnasun M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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