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________________ धर्म- // 6 // कोटिं याचे सुवर्णस्य / दीनादेर्दानसाधिकां // हस्त्यश्वरथपादाति--साधने सापि नो स हा // 27 // चिंतावीचिचयोदिप्त-लोजसागरमध्यगः // स्थितः संचिंतयन्नेवं / दणं संतोषवर्जि "| तः // 20 // शुरूत्वाज्जीवरूपस्य / चित्रत्वाकर्मणां गतेः // जज्ञे सद्ज्ञानसंयोगः / कपिलस्य त. 357 | तो दृढः // 27 // ततः सद्ज्ञानसंयोगा-चिंतयामास तरदाणं // अहो लोजस्य माहात्म्य-म. पूर्व सुखकारणं // 30 // यतः- यदि स्यादनसंपूर्णो / जंबूद्दीपः कथंचन // अपर्याप्तः प्रहर्षाय / लोभात्तस्य जिनैः स्मृतः // // 31 // अहो मया किमारब्ध-मझानवशवर्तिना // विज्ञाय वचनं मातु-विद्यादातुश्च सुंदरं // 3 // जाननपि यदासक्तः / सामान्यायां स्त्रियामहं / / तदिदं सत्यतां नीतं / वचनं मोहवर्तिना // 33 // सन्मार्गे तावदास्ते' प्रगवति पुरुषस्तावदेवेंडियाणां / लगा तावविधत्ते विनयमपि समा. लंबते तावदेव / / चूचापाक्षेपमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपदमाणं एते / यावलीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिवाणाः पतंति // 34 // ताव फुरश् वेरग्गु / चित्ति कुलालज्जवि तावहिं ताव // अ. कडाहतणि य संक / गुरुयाणवि गजे ताव // 35 // ताविदियह वसा / जसह सिरिहाश् ताव | P.R.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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