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________________ धर्मः / // 3 // अथ तत्र पुरे तस्य / संजाता चित्तनिवृतिः // नन्मुय वासनं पत्र्यं / चिंतितं मूढचेत हम सा // 30 // सत्यापूितश्च तातेन / जनवादोऽयमीदृशः // वृछत्वे हि मनुष्याणां / पंचानिष्टसमु. अवाः // 40 // दुर्गाषालीकञ्चाषित्वं / निर्लऊत्वं नयं तथा // तृष्णा च प्रत्यहं तस्य / देहेन स. ह वर्धते // 41 // यदसौ न विजानाति / युक्तायुक्तविवेचनं // विवेकविकलो वृक्षो / जरया वि. मनीकृतः // 42 / / धनिनो यौवने धन्या / धननोगोपजोगिनः // संरदितेन किं तेन / दत्तमुक्त फलं धनं // 53 // एवं वितर्त्य स खांते / गतः कांदविकापणे / जुक्तो यथेच्या तेना-हारश्व मनसः प्रियः // 44 // किंचिघनमधन्येन / वेश्याभिः सह नदितं // किंचियतेन तत्तेन / हा. रितं हीनकर्मणा // 45 // पुष्पेषु व्ययितं किंचि-किंचित्तांबूलचदणे // किंचिद्गायकलोकेषु / नग्नाचार्येषु किंचन // 46 / / किंचित्किंचितं सर्व / तस्य हस्ते न किंचन // ततो नकिंचनो जातः। दामकुदिः सुधालयः // 4 // पाटिताखिलसहस्त्रः / कृतकडोटकः कुधीः // कुंजकारापणे ग. वा / गृहीत्वाखंडहमिकां // 4 // रज्ज्वा संयम्य यत्नेन / गृहीत्वा दक्षिणे करे // निदां बनाम सर्वत्र / पुरे कार्पटिको यथा // 4 // युग्मं // यतः-अनिमतमहामानग्रंथिप्रभेदपटीयसी / गुः / Jun Gun Aaradhak Trust PP.AC. Gunratnasuri M.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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