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________________ धर्मः / विनयानतविग्रहः // ऊचे कृतशिरःपाणिः / कार्य तात निगद्यतां // 40 // राजाह सत्कुले ज | न्म / रूपं रोगविवर्जितं // वयोऽतिसुंदरं पुत्र / वित्तं तव गृहेऽधिकं // 41 // परिजनो विनीतश्च / खाज्ञैश्वर्य च सुंदरं // जनानुरागः सौजाग्यं / जातं ते पुण्ययोगतः // 42 // विलासकारणे यूनां / / वसंते समुपस्थिते // विलासविमुखेनेह / मुनिनेव किमास्यते // 3 // कुमारः प्राह-श्रूयतां कारणं तात / येन न क्रियते मया // विलासो यौवनस्थेन / वसंतेऽपि समागते // 44 // कायश्चकास्ति रूपेण / रूपं जाति सयौवनं // श्रृंगारौवनं जाति / श्रृंगारा अपि संपदा // 45 // अ. थवा-सुगुणै. रूपमाजाति / रूपं नाति मुशीलतः / / शोनते सर्व एवेह / लोको लदम्या विशा लया // 46 // विवाधियात्रासुः। मित्राणां संगमे तथा // जायते माननंगो हि / मानिनामस्पसंपदा // 4 // यथाकाशं विना चंद्रं / सरोऽपि कमलैर्विना // शोगते नैव लोकेऽस्मिं-स्त था जोगो धनं विना // 4 // नन्नतिर्जायते लोके / निःसंगानां धनं विना // विलासिनां विना वित्तै-र्जायते मानखंडनं // 4 // तस्मादलं विलासैनः / स्वल्पकालैः स्वपोषकैः // श्रुत्वेदं व| चनं राजा / चिंतयामास मानसे // 20 // विलासचित्तो मत्सूनु-महेहोऽयं नरोत्तमः // नैवास्य / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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