________________ 305 धर्मः | निजे चित्ते / संजाते व्यजने गृहे // 25 // वसुना वसुसारस्य / कर्णे तवं निवेदितं // क्रमाग समता मया मुक्ता / लक्ष्मीवत्स तव गृहे // 26 // चंचलैषा स्वजावेन / जवंतं यदि मुंचति // तदा भूमिगृहस्यांत-रुद्घाट्या मंजूषा त्वया // 27 // तदंतलिखितं पत्रं / मयैवास्ते सविस्तरं // तदा दाय रहः स्थाने / वाचनीयं शनैः शनैः // 20 // तदर्थो हृदये धार्यः / कर्तव्यं च क्रमागतं // न. पदासपरो लोको / यत्किंचन वदेत्पुनः // 27 // तद्दचो हृदये नैव / कर्तव्यं हितमिलता / प्रति पन्नमनेनापि / तहवनं तथैव च // 30 // युग्मं // सुपुत्राणां सुशिदाणां / नाप्तवाक्ये विचारणा॥ ततोऽसौ दर्शितो राज्ञः / स्वपदे च निवेशितः // 31 // बडो नालतले पट्टो / दत्तं छत्रं महीनु. जा // प्रथमासनिको जातः / सर्वेषां वणिजामयं // 32 // परिवारोऽपि संतुष्टः / पैत्र्यं पदमघिष्टितं // वसुना वसुसारस्य / दत्ता शिदा यथोचिता // 33 // ततः स्वधर्मकर्माणि / चकार चतुराशयः // अव्यबीजं विधानेन / सप्तक्षेत्र्यां नियोजितं / / 34 // ततः समुध्धृतं शल्यं / दमितदामितं कृतं // कृता देवगृहे पूजा-ऽमारिश्वोद्घोषिता पुनः // 35 // निर्ममत्वं घृतं चित्ते / पंचधाराधना कृ | ता / सर्वाहारनिरोधश्च / स्वीकृतो गुरुसादिकः / / 36 // धर्मध्यानसमारूढो / मृत्वा स्वर्ग जगाम P.P.Ac: Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust