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________________ धर्म गेन / यममुखादिनिर्गतः // 5 // त्रिनिर्विशेषकं // चराचरजगन्नाथः / पुत्रीयितजगत्त्रयः // त्रा. एं मे श्रीमहावीरो / यावजीवमतःपरं // 53 // इति संवेगमापन्नो / जवानिर्वितमानसः // चचा. |ल श्रीमहावीर-पादवंदनहेतवे // 14 // वंदित्वा त्रिजगन्नाथं / निषामः शुष्त ले // भणितं किं जगन्नाथ / ममास्ति व्रतयोग्यता // 55 // अस्तीति जणितस्तेन / शीघमात्मा समर्पितः // जाणितः प्रचणा जाऊ / चित्तशुधिविधीयतां // 26 // अत्रांतरे समायात-श्चतुरंगवलान्वितः // | वंदनाय जिनेंद्रस्य / श्रेणिको मगधाधिपः // 17 // प्रविश्य विधिना तत्र / दत्वा च ब्रामरीत्रयं // | वंदित्वा च महावीरं / निषसादोचितासने // 27 // ततश्च लोकनाथेन / प्रारब्धा धर्मदेशना / / कर्णामृतसमा सारा / संसारोबेदकारिणी // 27 // ततः प्रपेदिरे केचिद् / गृहिधर्म सदर्शनं // अन्ये च शुरूचारित्रं / सफलाजनि देशना // 60 // समयं प्राप्य नृपेन / ततः पृष्टो जिनेश्वरः || रौहिणीयाह्वयो नाथ / कुत्र तिष्टति तस्करः // 61 // प्रकाशयास्य कर्माणि / नामापि प्रकटं प्र. जो // परं निरूपितोऽस्माजि-र्न चासौ दृश्यते दृशा // 6 // उवाच भगवानेष / दक्षिणेन म| माग्रतः / तिष्ठति लीनगात्रोऽसौ / निषमः शुभृतले // 3 // सन्मुखो मोदमार्गस्य | पापकर्म P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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