________________ 206 धर्म: | दीयतां // 3 // नणितं भूमिनाथेन / नऊ किं न श्रुतं त्वया // यदुक्तं पौरलोकेन / विरागवि. | धुरं वचः // 24 // तस्करं वा लगवाशु / लोकानां देहि वा धनं // न लभ्यते मुधा मूढ / त्वि दमारदिकं पदं // 25 // कृता गवेषणा तेन / बहिरंतश्च सर्वतः // न लब्धस्तस्करः कापि / ततो राज्ञे निवेदितं // 26 / / न दृष्टस्तस्करो देव / न धनं मम विद्यते // यादृशं सर्वलोकानां / दी. यते प्रजुवाक्यतः // 7 // एते वयमिमे प्राणा। गृहसारोऽपि तावकः // कुरु यद्रोचते तुव्यं / किमन्यैर्बहुजल्पितैः // 20 // ततो राझा समाहूतो / मंत्री मंत्रिपुरस्सरः // नानाजयकुमारोऽथ / साक्षेपं च प्रजाषितः // 20 // वत्स पंचाहमध्ये त्वं / तस्करं प्रकटीकुरु // नो चेत्तस्करदंडस्ते / पतिता नास्ति संशयः // 30 // यदादिशति तातो मे / तत्करोमि न संशयः // तिष्टत सुस्थिता यूयं / नारोऽयं मयि संभृतः // 31 / / ततस्त्रिकचतुष्केषु / शून्यागारगृहेषु च // वेश्यागृहेषु सर्वेषु / ध्वजिनामापणेषु च // 32 // नदीकूपतमागेषु / देवतायतनेषु च // निरूपितो न च दृष्टो / गू. ढचारी स तस्करः // 33 // गतान्यहानि चत्वारि / पंचमे च समागते // यामिन्याश्चरमे यामे / ह्यनयेन विचिंतितं // 34 // हुं विज्ञातो मया नैष / दारचारी मलिम्बुचः // तदस्य ग्रहणे कोऽ. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust