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________________ 3 धर्मः | जकथानकमिदं बभूव जारते क्षेत्रे / देशे च मगधानिधे / दितिप्रतिष्टितं नाम / पुरं शक्रपुरोपमं // 1 // | जांति यत्र सपद्मानि / सरांसि च गृहाणि च // कामिन्यः काव्यबंधाश्च / सालंकाराश्चकासति // | // 2 // शूरः सत्यप्रतिज्ञश्च / तत्रासीद् दुर्गशासनः // चंद्र श्व प्रजानंदो / डोणमेघो नराधिपः / / // 3 // सहजातो क्रोमितो धूव्या / सहैव च विवर्धितः / निर्णाग्यशेखरस्तस्य / हुंगरोऽजनि से वकः // 4 // ददाति शतशो राजा / बालमित्रधिया धनं / / तच्च तस्य कचिद्याति / दारिद्यमवति. टते // 5 // ततोऽसौ निष्फलाग्नो / दीनो दारिद्यजाजनं // कष्टां दशां समापन्नः / कष्टं नयति वासरान् // 6 // अन्येाः साधिताशेष--प्राजातिकप्रयोजने // सन्नासिंहासनासीने / द्रोणमेघन राधिपे / / 7 / / वर्णगंधरसस्पर्शे-हृद्यं जनमनोहरं // बोजपूरफलं राज्ञे / मालाकारेण ढौकितं // // // प्रयोजनवशायाता / राजमाता वसुंधरा / / सन्मानिता नरेंखेण / भद्रासनमुपाश्रिता // 7 // यावदास्ते दणं तावद् / मुंगरोऽपि समागतः // प्रणम्य जूनुजः पादा-निविष्टो दर्शितासने // // 10 // वसुंधरा बनाणेदं / राजानं जातविस्मया // किमेष दुःखितो वत्स / हुंगरस्तव सेवकः // P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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