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________________ धर्मः // 6 // ततश्च प्रेरिताः पोताः / प्रवृत्ता गंतुमुच्चकैः॥ प्राप्ता मलयदेशांत / तत्र स्थाने धृतास्ततः / // 63 // फलदेवः समुत्तीर्णः / सत्वरं सपरिबदः // गत्वा तत्र पुरा दृष्ट-काननस्थजिनालये // // 64 // दृष्टः श्रीमङिनाधीशः / पूजितो वंदितस्तथा // कारिता च वरा यात्रा प्रबंधन दिना. 230 ष्टकं // 65 // तृतीये च दिने तत्र / वनमाला समागता // पृष्टा च फलदेवेन / किं चिरादत्र दृ श्यसे // 66 // तयानाणि गताहं गो। दीपे नंदीश्वरान्निधे / / तत्र संति समुत्तुंगा / द्वापंचाश जिनालयाः // 67 // तताशेषसुराधीशे-रष्टाह्निकामहोत्सवः // चक्र जैनेंद्रबिंबानां / गताहं तद्दि हृदया // 6 // युष्मानिह समायातान / विलोक्येह समागता // फलदेवस्ततः प्राह / कौतुकाकुलमानसः // ६ए / यदि नो गम्यते तत्र / दृश्यंते ते जिनालयाः // वंद्यते जिनबिंबानि / सु. दरं जायते तदा // 70 // वनमाला ततः प्राह / गम्यतां नो नयाम्यहं // पूरयामि तवान्नाष्टं / ध. र्मबंधो यथा तथा / / 71 // स प्राह स्वयमेवाहं / गगने गंतुमीश्वरः // अयं तु त्वयका नेयः। शु. नचंडः मुहन्मम // 7 // अयोक्तं रत्नसुंदर्या / नयस्व प्रिय मामपि // कथं नयामि तत्रेमां / यावचिंतापरोऽनवत् / / PP.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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