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________________ धर्मतिस्म नृतले // 3 // तथेदं मंदिरं जैनं / कारित रत्नमालया // बारामश्चानिरामोऽयं / नानाः | टीका वृतासमाकुलः // 4 // वनमाला पुनश्चेदं / सुंदरारामराजितं // प्राकारवेष्टितं तुंगं | यदालयम चीकरत् // 79 // वदंती रत्नमालासौ / वनमालां च मत्सरं // व्याघातं यदपूजायाः। प्रचक्रे रा. 214 जवर्चसा // 6 // श्रादाय सर्वपुष्पाणि / सर्वारामोद्भवानि सा // कारयति सदा पूजां / स्वकीये जिनमंदिरे // 7 // तयाजियते वाढं / वनमाला पदे पदे // दृयते च दृढं चित्ते / ततः सैवमचिंतयत् / / // राजा च रलमाला च / कुर्वते मे पराभवं / / न शक्ताहममुं सोढुं / तस्मादमौ विशाम्यहं / / 77 // वहंती मत्सरं घोरं / ततः सा दंपतीप्रति // अवज्ञाता च सा राझा / प्रविवे. श हुताशने // 10 // मृत्वा च व्यतर। जाता / विज्ञाय झानतस्ततः // आगत्य रुष्टया तूर्ण / शंखचूमो निपातितः | // 1 // ससुता रत्नमाला च / शेषलोको बहुस्तथा // शंखावर्त पुरं दग्धं / धनधान्यसमाकुलं / // ए॥ तथा सर्वोऽपि देशोऽयं / निर्दयोहासितस्तया // शोषितश्चायमारामः / प्राकारश्वास्य पा. तितः // ए३ // देवकुलानि सर्वाणि / संचमान्यत्र कानने // अथेदं नक्तुमारब्धा / मौलं देवकु. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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