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________________ धर्मः | बच्व तत्र विख्यातः / शंखचूमानिधो नृपः // तद्भार्या वनमालाख्या / रूपसौगाग्यशालिनी // 7 // पुत्रश्च वनमालायाः / शंखनामा तथाजनि // स पित्रा यौवनं प्राप्तो / यौवराजपदे कृतः // 73 // छत्रचामरहस्त्याद्यं / तस्मै दत्तं महीनुजा // ततोऽसौ जुज्यते भोगान् / विलसन् राजली. 213 लया // 14 // इतश्च दक्षिणश्रेण्यां / वैताढयेऽस्ति महापुरं // रथावर्त प्रस्तत्र / विद्याधरो मणि प्रनः // 15 // तनार्या रत्नरेखाख्या / रत्नमाला च तत्सुता / / सान्यदा शंखचूडेन / मा पर्यणीयत // 16 // कालेन गलता जाता | सा राझोऽतीववल्सना // अहं पुनरनिष्टेति / दुर्गदौ ग्ययोगतः // 9 // किंबहुना तयाकारि / वशवर्ती नराधिपः // युक्तमयुक्तकं वापि / करोत्येव स तहुचः // 7 // अन्यदा च सुतस्तस्या / जातो रनप्रनानिधः // क्रमेण यौवनं प्राप्तः / नारीजन: मनोहरं // 15 // प्रधानराजपुत्रीश्च / महा परिणीतवान् // बुलुजे काम सौख्यं / तान्निः सा. धै स संततं // 70 // अन्यदा नणितो राजा / सादरं रत्नमालया // यथाएं मामकं पुत्रं / यौव. राजपदे कुरु // 1 // तेनापि तत्तथाचके | सर्व तदशवर्तिना // अतीव च पराजुतः / शंखनामा महीभुजा // 72 // ततोऽसौ वनमालाया / अनाख्यायैव निर्गतः // दुरं देशांतरं प्राप्तो / बंचमी. PP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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