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________________ 205 धर्मः | रयोगेन / जाता गाढविसूचिका // 27 // ततो मृत्वा समुत्पन्न-स्त्वं तारप्रजनंदनः // महा ते कृतं, नाम / कणसार इति स्फुटं // 17 // जिनाग्रे तंमुला दत्ता / जावतश्चानुमोदिताः / / कणसार | कणास्तेन / तव वृधिमुपागताः // 50 // श्रुत्वेदं कणसारेण / स्मृता जातिश्चिरंतनी // नगवन्न पारसंसार-जयजीतस्त्वदंतिके // 60 / / व्रतं च लातुमिबामि / यद्यस्ति मम योग्यता // व्रतादानमयोग्यानां / यतोऽनर्थाय वर्तते // 61 // सूरिणाजाणि जो श्रेष्टिन् / योग्यस्त्वं धर्मकर्मणां // अविघ्नं भवतो नुयात् / संयमाध्वनि गतः // 6 // सप्तक्षेत्र्यां धनं दत्वा / कृत्वा पूजां जिनालये // महीनाथमनुज्ञाप्य / बंदिमोदं विधाय च / / 63 // धनसारं पदे कृत्वा / सुताराकुदिसंभवं॥ इष्टमित्रजनं सर्व / संगाष्यादरपूर्वकं // 64 // दीनानाथजनं सर्व-मर्थिनं दुःस्थमानसं // सुस्थं कृत्वा यथाशक्त्या / थाहारादिप्रदानतः // 65 // तृणवत्सर्व परित्यज्य / बहिरंतः परिग्रहं // मेघनादांतिके श्रेष्टी / प्रपेदे सर्वसंयमं // 66 // चतुर्भिः कलापकं // . ' श्रेष्टिनः कणसारस्य / काप्यपूर्वा महार्थता // स्ववित्तं कोटिशो दत्तं / स्फटाटोपो न दर्शितः / // 67 // गर्जित्वा बहुदुरमुन्नतिभृतो मुंचंति वार्यबुदा / नदस्यापि गजस्य दानसमये संभाव्यते दुः। Jun Gun Aaradhak Trust SP.P.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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