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________________ धर्मः // 27 // प्रतापः पप्रथे तस्य / मेघमुक्तरवेखि // चचाल चतुरंगेण / बलेन भृततलः // 7 // खत एव समागत्य | राजनिः परिवारितः // शालाटव्यां समागत्य / तारया कृतगौरखः // // ताराकरःसमासने / आवासं कृतवान् स च // चतुर्वर्णसमाकीर्ण / नानावेश्मसमाकुलं // 30 // 174/ विशालशालसंजनं / खातिकापरिवेष्टितं // विचित्रचित्रसंपन्न-चतुर्गापुरराजितं // 31 // पुरं ता. रापुर नाम / स्वल्पकालेन कारितं // दत्तं युगादिदेवस्य / सारामं पुण्यहेतवे // 35 // चतुर्निः कलापकं // नानुप्रजनरेंण / ताम्रशासनलेखितं / समर्पितं च संघाय / जिनपूजनकृते पुरं // 33 // अन्यदा नाणता तारा / मातर्गहामि सांप्रतं // करसंपुटमादाय / तयापीदं प्रजल्पितं // 34 // स. [म्यगेंणामुखी राजन् / दृष्टव्या स्निग्धया दृशा // त्वमस्याः सर्वकार्येषु / हर्ता कर्ता च संपदं // 3 // | चचाल स्वप्रतापेन / समाक्रांतमहीतलः // पश्चिमां दिशमाश्रित्य / प्रजाते सविता यथा // 36 / / श्रागतं समाकर्य / जानुप्रजनराधिपं // सिंहविक्रमराज़ेन / मत्सरेण पलायितं // 37 // बहिरावासितो राजा / समये च प्रवेशितः // कृतद्दिशोन्नं नगरं / मंचमालांविराजितं // 37 // सोत्कंठा। श्च प्रजाः सर्वा / दर्शनार्थ समागताः // अहो रूपमहो रूप-महो कांतिमनोहरा // 35 // सकः | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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