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________________ धर्मः | प्राणप्रियो भूत्वा / निजपितुस्त्वमीदृशीं // अवस्था प्रापितो धाता / घिम्विमातृविचेष्टितं // 4 // / स. कुमारेणापि निःशेषो / वृत्तांतः कथितो निजः // तयोक्तं नैव ते खेदः / कर्तुं युक्तो मनागपि // // 43 // यापदः संपदश्चैव / समीपस्थाः शरीरिणां // अस्तोदयौ दिनस्यांतः / सूर्यचंऽमसोरिख / // 4 // यस्ति जानुमती नाम / मे गिनी सहोदरी // कलिंगविषये पुर्यां / नगर्या जनवत्सला // 45 // तत्रस्थेन त्वया वत्स / नेतव्या विषमा दशा // पश्चादहं करिष्यामि / सर्वं यदुचितं तव // 46 // इत्युक्त्वा तदाणादेव / पुर्या नीतो निजांगजः // नीत्वा समर्पितो नक्तं / चानुमत्या विशेषतः // 4 // चिंतामणिमणिं दत्वा / समाघाय च मूर्धनि // ध्यातव्या व्यसने वत्से-त्येवमुक्त्वा तिरोदधे // 40 // जानुमत्यपि सत्त्रीत्या / पश्यंती कुमरंप्रति // करोति शेषकार्याणि / स. तां स्नेहः सदा समः // 4 // अथ विज्ञाय तत्रस्थं / जानुप्रभकुमारकं / हारप्रजा दृढं चित्ते / दू. ना चैवं व्यचिंतयत् // 50 // अहो पुण्यैः स्वकैरेव / जीवत्येष कुमारकः // निखातं हृदि मे शल्यं / नितरां न समुध्धृतं // 51 // यदा तदापकाराय / जीवन्नेष न सुंदरः // सर्वदापि भयस्थानं / व | र्धमानः सुनिश्चितं // 12 // प्रेषिता घातकास्तत्र / विषदा गूढचारिणः // चूर्णयोगकराश्चान्ये / यो Jun Gun Aaradhak Trust P.P.AC.Gunratnasuri.M.S.
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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