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________________ धर्मः | नपि निर्जितः // 17 // दुःसहेन प्रतापेन / रूपेण यशसा श्रिया // शेषैरपि गुणैः सर्वै-स्तेनाः | सतिशयितः पिता // 10 // द्वासप्ततिकलानां यः / परं पारमुपागतः // धामामलगुणानां च / र. लानामिव सागरः // 50 // चलत्वाज्जीवितव्यस्य / तथा सोपक्रमत्वतः / जानुश्रीः सर्पसंदष्टा / 157 | जगामान्यनवांतरं // 1 // तत्पदे स्थापिता चान्या / देवी हारप्रणानिधा // तजुणैर्विस्मृता तस्य / नानुश्रीः सा हृदि स्थिता // 25 // यद्बते तत्करोत्येव / यत्कृतं तत्कृतं तया // अविचारो नृपः स्तत्र / यथा गरिको नरः // 13 // यौवनं पल्लवस्तस्याः / सौगाग्यं कुसुमोद्यमः // सूरनामा गु: णाधारः / सत्पुतः फलसन्निनः // 24 // जानुप्रनं विलोक्यासौ / विधत्ते हृदि मत्सरं // यावदेष कुतस्ताव-द्राज्यं तत्तस्य जायते // 25 // अवज्ञाःखदावामि-दग्धदेहापमानतः // यदेष दूरतो याति / म्रियते वा तदा सुखं // 16 // अन्यदा नणितो वत्स / हिताहं तव सर्वदा // जानु श्रीखि दृष्टव्या / कथनीय प्रयोजनं // 27 // वस्त्राचरणतांबूल-नदयनोज्यविलेपनं // पुष्पाणि च विचित्राणि / संपादयति कस्तव // 20 // कर्म संपादयत्येव / नान्यः कोऽपि मतिर्मम / किन | दत्ते. पिता पुत्र / नेति तेन प्रजल्पितं // 25 // प्रोक्तं चतुर्गुणं कृत्वा / चित्तोतारकृते तया // रा. PP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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