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________________ धर्मः। ते, कतिपयदिनमध्ये शीघमागंतव्यमिति. कुमारेण चणितमवगतो लेखार्थः. अथ किं कुशली मे तातः? निर्व्याकुला च पुत्रवत्सलांबा? तावूचतुः-मातुामिलिते दृष्टी / रुदंत्याः प्रतिवासरं // तवादर्शनदुःखातः / पिता कष्टेन जीवति // 4 // नवदर्शनलिप्सूनां / गुरूणां काप्यनिर्वृतिः // 140 युक्तायुक्तविचारे च / नवानेवात्र पंडितः / / 10 // प्रयाणेलुकुमारेण / मातुलास्य निरीदितं // तेनापि जाणितं वत्स / गम्यते न विलंब्यते // 51 // चतुरंगबलोपेतः / कुमारमनु मातुलः // निजपुतीं समादाय / कुमारार्थ सुदर्शनां // 5 // चलितस्तरसा रम्यां / रंगशालां महापुरीं / / प्रा. | प्तः कतिपयैरेव / वासरमसुंदरः // 53 / / युग्मं // बहिरेव कृतावासो। विवेशांतः स्वयं नृपः // निवेदितं विशांपत्यु-व्या च सह मंत्रिभिः // 14 // अस्ति मे दुहिता कांता / वरप्राप्ता सुदर्शना // अत्रैव सा समानीता / प्रीत्या कुमरहेतवे // 55 // यदि वः संमतं चेदं / तदा लनं नि: रूप्यतां // यत्रांतरे समायातो / गणकः खत एव हि // 16 // स्वप्रयोजनमुद्दिश्य / मुप्रसन्नः सु वेषभृत् // कृतानुझो नरेंडेण! निषलो दर्शितासने // 27 // युग्मं // रिक्त रिक्तं विजानीयात् / पूर्णे पूर्ण समादिशेत् // तांबूलफलपुष्पादि-कृतपूजो महीजा // 50 // पृष्टो लमं विवाहस्य / / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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