________________ ' धर्मः | सरति संसारे / मासदपणपारणे // तपस्वी तपसा दीणो / दुर्गिलागृहमागतः // 7 // दृष्ट्वा सा. माधुं सदाचार-मसदाचारया तया // प्रयुक्तं कर्कशं वाक्यं / दुष्टं दुर्गतिकारणं / / ए || किं नास्ति कोऽप्युपायस्ते / मुंड निर्वाहकारणं // सुखाय चाश्रितो येन / झुपायः परपीमकः // 10 // श्रुत्वै११० | तत्साधुदेहस्थो / गुणग्राही महोदरः // यदास्तां वक्तुमारेभे / रुष्टः कर्कशया गिरा // 11 // यदि पापे न ते श्रधा / दातव्यं वा न विद्यते // निषेधस्ते तदा श्रेया-नो कर्कशप्रजल्पितं // 12 // दौर्चाग्योपरि दौ ग्यं / दुर्गिले ते चविष्यति // गंडांतःस्फोटिकातुल्यं / दुर्गतिं च गमिष्यति / // 13 // एवमुक्त्वा गतः साधु-हितीयदपणे स्थितः॥ निदामटति नान्यत्र / विमुच्य प्रथम गृहं // 14 // साप्युत्कटमहामोह-वेदोदयविवर्तिनी // येन तेन समासक्ता / परं सर्वेण वर्जिता।। // 15 // न शीलं यमदीनत्वा-न कामा दुर्भगत्वतः // न धर्मो वासनासाध्यः / स च तस्या न विद्यते // 16 // धन्यदा मिलितः कोऽपि / उर्जगः कुलपुत्रकः // तेनापि दूरतस्त्यक्ता / दौ! ग्यप्रचुरत्वतः // 17 // अन्यदा च मृतो नर्ता / जाता रंमा निरर्गला / / शिविता मधुसुंदर्या / ततो जज्ञे समत्सरा | . P.P.AC. Guinratnasun M.s. Jun Gun Aaradhak Trust