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________________ 107 धर्मः | ग्धं शरीरकं // 46 // प्रविदामि शिरस्यस्य / दत्वा बाहूपधानकं / / परलोकगतस्यापि / नवाम्युत्सं. गशायिनी // 4 // श्रुत्वेदं विस्मितो लोकः / शिरोधूननपूर्वकं // अहो महासती धन्या / जगा. देदं परस्परं // 4 // पतिजक्तं गुणे सक्तं / शीलाचरणषितं // एवंविधं कलत्रं हि / नाल्पपु. एयैरवाप्यते // 45 // सा धृता बंधुनिर्गेहे / नीतं नर्तृकलेवरं // विधाय तस्य संस्कारं / यथास्थानं गता जनाः // 50 // रोरेदमपि संदृष्टं / मदीयं वैशसं त्वया // न कार्यः स्त्रीषु विश्वास / उपदे शोऽयमुत्तमः // 51 // कुमारस्तत्तथा दृष्ट्वा / चिंतयामास मानसे / पुस्तकानि पञ्तोऽपि / स्त्रीच स्त्रिं न जानते // 55 // प्रथमं मारितो गर्ता / पश्चाज्जारोऽपि घातितः // ततोऽपि रंजितो लो कः / स्वयं जाता महासती // 53 // अलब्धांतःप्रवेशाय / कूटकपटवेश्मने / संसारतरुबीजाय / स्त्रीवृत्ताय नमोनमः // 14 // सर्पिण्येव महाजीति-कारिण्या वक्रर्यया // यज्जीव्यते तदाश्चर्य / समीपस्थितयानया // 55 // अयशोजननावासो-ऽपकीर्तेः कुलमंदिरं // दुर्गतौ गबतां पुंसां / समा सोपानपंक्तिका // 56 // सर्वाभ्याख्यानशस्यानां / क्षेत्रं दुःकर्मणां खनिः॥ सत्यशौचबहिईता / महासाहसकारिणी // 17 // युग्मं / P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust Jalia sri tainsaatra..
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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