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________________ धर्मः क्त्वा-शरणां मां कृपास्पदां // गबनविन विज्ञातो / हृदयस्थोऽपि सर्वदा // 35 // हा विधे ते | कृपा नास्ति / किं कृतं मूढ वैशसं // यस्त्रियोऽपहृतश्चित्ता-द्रविताहं कुरोऽधुना // 36 // किं गु. णान वर्णयाम्यस्य / किं सौगाग्यं मनोरमं // किं रूपं किं मति त्यागं / किं जोगं विस्मयावहं / / 106 // 37 // मांसलौ परिघाकारौ / करौ कनककोमलौ // मदंगसंगमं त्यक्त्वा / कयमेतौ करिष्षतः // 30 // ज्वलज्ज्वालावलीसंग | पश्यतां जयकारणं // अहो कर्मवशाजीव-जीवद्भिः किं न ह श्यते // 35 // जसितमिवाभाति / जनलदासमाकुलं / कांतारसदृशं कांतं / पुरं नाय त्वया विना // 40 // त्वया त्यक्तापि नो त्यक्षे / जवंतं चुंबकोपलं // मम चित्तायसं यस्मा–वमाकर्ष सि दूरतः // 41 / / नीतिरेषा जने रूढा / धर्मोऽयं मनुनेरितः॥ मृतमप्यनुगति / जारं कुलकन्यकाः // 42 // एवंविधसमुखाप-संजातकरुणैर्जनैः // जणितानि कर्तव्या / यदे षैव जव. स्थितिः // 43 // एतत् श्रुत्वा जनोल्लापं / बहिर्दर्शितशोकया // लोकानां रंजनाहेतो। रुदंत्या न | नमिदं वचः // 45 // कुरुतेकां चितां गुर्वी / सारकाष्टविनिर्मितां // निर्वापयामि येनेदं / दुःखद. P.P.AC. Gunrainasuri M.s. Jun Gun Aanadhak Trust
SR No.036436
Book TitleDharmratna Karanda Tika Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1915
Total Pages404
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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