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________________ धम्मिः वरिपरीवारो / न मे कौतुकयत्यपि // न हि किं वेष्ट्यते लोकैः / कुचेष्टाकृविदूषकः // 5 // एवमालापिनी तां च / विमलां च स्थस्थितां // आदाय प्राविशत्पुर्या / महेन स महीनसूः / 60 / सारसद्मनि संस्थाप्य / पूरयित्वाशनादिकं / / वसनाशननिश्चितं / कुमारो धम्मिलं व्यधात् / / 61 / / 617/ | तं विलासियशोराशि-प्रकाशितदिगंतरं / न कदापि सदाचार-मिव तत्याज राजसूः // 6 // | यत्र झाने च विझाने / कुमारस्तं परीदते // तत्र यबत्यसौ जात्य-सुवर्ण श्व वर्णिकां / / 63 / / पास शुं लोको एकठा थता नथी? // 5 // - एम बोलती ते कमलाने तथा विमलाने पण रथमां बेसामीने ते राजपुत्र महोत्सवसहित नगरीमां दाखल थयो. // 60 // पछी तेने मनोहर घरमां जतारीने तथा भोजनयादिक पूरी पा. मीने ते राजकुमारे धम्मिलने स्थान तथा नोजनमाटे निश्चिंत कर्यो. // 61 // फेलाता यशना समुहथी दिशानने प्रकाशित करनारा ते धम्मिलने सदाचारनीपेठे को पण समये पोताथी ज दो पाड्यो नहि. // 6 // जे ज्ञान अथवा विझानसंबंधि कुमार तेनी परीदा करे , तेमां ते जमदा सुवर्णनीपेठे नमुनो आपे . // 63 // ते राजकुमार वनक्रीमा, जलक्रीमा तथा कलाः | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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