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________________ धम्मि- धामन्यवस्थिता // 35 // तश्च तदहशेषं / हिजस्य युगवद्ययौ // सह तस्य विवेकेन / प्रापद | स्तं दिवाकरः // 36 // थथा यथा वितस्तार / वि वैगावरं तमः / पौष्पायुधं तमस्तस्य / हृदयेऽ. पि तथा तथा // 30 // तथा च लब्धावसरः / प्रसरप्राप्तदुर्मतिः // अस्या समारं शृंगार-नासुरो 571 | विजराज्ययौ // 30 // समाया तं समायातं / कृतकृत्रिमसंत्रमा // सामोहयत् प्रियालाप-नीच. | त्यासनापणैः // 35 // नाझासीत्कामबुब्धोऽसौ / तस्याः कपटपाटवं // गीतासक्तो मृग श्व / वी. हिमती शीलवती पोते सुनटीनीपेठे घरनी अंदर रही. // 35 // हवे ते दिवसनो बाकीनो नाग ते ब्राह्मणनो युगनीपेठे गयो, एवामां तेना विवेकसाथे सूर्य पण अस्त पाम्यो. // 36 // पी जे. म जेम पृथ्वीपर रात्रिनो अंधकार विस्तार पाम्यो, तेम तेम तेना हृदयमां कामदेवसंबंधी अंधकार पण वृधि पाम्यो. // 37 // पनी अवसर थवाथी बने दुर्बुधि पण विस्तार पामवाथी शृंगारथी दे. दीप्यमान थने ते ब्राह्मण तेणीने घेर गयो. // 30 // सारे ते कपटी शीलवती पण तेने या. वेलो जाणीने जूग संत्रमपूर्वक प्रियवचनोथी नीचे नमी यासन आपी तेने मोहित करखा ला. गी. // 35 // ते कामबुब्ध ब्राह्मण तेणीनी या कपरक्रिया जाणी शक्यो नहि, केमके गीतमां P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036433
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages204
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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