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________________ धम्मि पन्निव // 10 // न्यस्तनयनो मार्ग / दुर्गतेः स्पृहयन्निव // परिवार ददृशे तेना-जगबन जी. | वनात्तदा / ए१॥ चतुर्भिः कलापकं / / उद्भवपिमिकं दीर्घ जंघमारक्तलोचनं // स्तब्धकेशं वक्रनाशं / निश्चिक्ये तं स तस्करं // ए॥ सोऽपि खोपधिमालंब्य / शाखायां तस्य शाखिनः / / 37 निविष्टो विष्टरीकृत्य / च्युतपत्राणि नृतले // ए३ // जमपोतमिव दीण-सर्वस्वमिव दुःखिनं // नि. मणे हाथे जपमाला फेरवतो, // // मनुष्यरूपी मत्स्योने बांधवानी जाणे जाळ होय नहि ते. वी कंथाने गनमां धारण करनारो, तथा जाणे चोरी करवानी विद्या जपतो होय नहि तेम श. ब्दविना होठ फफडावतो, // ए० // तथा अधोगतिनो मार्ग चहातो होय नहि तेम जमीनपर दृष्टि राखनारो एवो एक परिव्राजक जोगी तेणे जीर्णवनमाथी पावतो जोयो. // 71 // ऊंची पेनीवालो, लांबी जंघावालो, लाल अांखोवालो, स्तब्ध केशोवालो तथा वांका नाकवालो एवो ते. ने धावतो जोइने अगलदत्ते निश्चय कर्यो के खरेखर था चोर . // ए२ // पड़ी ते परिवाज क पोतानां उपकरण ते वृदनी माळमां टांगीने पृथ्वीपर पडेलां पांदडांगें आसन बिगवीने तेपर | बेठो. // ए३ // जाणे वहाण नांगी जवाथी समुद्र तरीने निकल्यो होय नहि एवा, तथा पोतानी Jun Gun Aaradhak Trust P.P.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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