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________________ धम्मि एयांगावन्यदा धर्म-रथस्यैकधुराविव // प्रवेशं दुर्गतौ वातुं / सुश्लिष्टावररी इव // 42 // अलिप्तौ पापपूरेण / संसृतेः पुलिनाविव // साधू सत्तपसाधूत-मोहौ तद्गृहमीयतुः // 43 // युग्मं // . | गयन्नुत्तमांगं स्वं / मंत्रिसूस्तत्पदांबुजे / किं वत्स विमनस्कोऽसि / मुनिन्यामित्यनाष्यत // 4 // 37 उदश्रुणाखिले मूला–निजदुःखेऽमुनोदिते // अयबतां यती धर्म-शिदा दुःखांतकारिणीं // 4 // माधुर्य लवणे सारं / रंभायां सुस्वरः खरे // पावित्र्यं वर्चसो गेहे / स्वादु पानीयमूषरे // 46 // जोगळसरखा, // 42 // पापोना समुहथी नहि लेपायेला, संसारना किनाराजेवा तथा उत्तम त. पथी मोहने नाश करनारा एवा बे साधुन तेने घेर अाव्या. // 43 // त्यारे ते मंत्रिपुत्र ते मु. निना चरणकमलप्रते पोताना मस्तकने ब्रमररूप करवा लाग्यो, त्यारे तेनए तेने पूज्यु के हे वत्स! तुं नदास मनवालो केम देखाय ? // 4 // त्यारे तेणे आंखोमां बांसु लावीने मूळ थी पोतानं दुःख कही संजलाव्यु, त्यारे ते मुनिए तेने दुःखनो नाश करनारो धर्मोपदेश या. प्यो के, // 45 // जेम लवणमां मोगश, केळमां कठिनता, खरमां सुस्वर, चमारना घरमां पवि. त्रता, खारी जमीनमां मीठं पाणी, // 46 // राखमां चीकाश, मषीमां सफेदा तथा अमिमां जेम Jun Gun Aaradhak Trust . P.R.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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