________________ धम्मि यरोगिवत् // 70 // अस्य विदधिरे वैद्यै-रुपचारा अनेकशः // गिराविव शरास्तेऽपि / सर्वे वैयर्थ्यमाई मीयिरे // 17 // मम जीवितसर्वखं / अश्वो विश्वोत्तराकृतिः // अनुपायात्परजवं / गंता तेनास्मि | दुःखितः // 70 // धम्मिलोऽनिदधे धीम-त्रहं जानामि चेष्टितैः // प्रबन्नं पापकर्मेव / शव्यं देहे. 514 | | अस्ति किंचन // 1 // ततः स चतुरो मृष्ट्या / सलिलक्विन्नया तदा // तुरंगस्य तनुं नितिं / सु. धावलेपयत्ययं // 7 // गयास्थे तुरगे पूर्व-मशुष्यद्यत्र मृत्तिका // तस्मिन्नवयवे शब्य-मंतःस्थं रो या उत्तम लक्षणवाळो वजेरो कोण जाणे शां कारणथी हमेशां दयरोगीनीपेठे दीण थतो जाय . // 70 // याने माटे वैद्योए अनेक उपायो कर्या, परंतु पर्वतप्रते जेम बाणो तेम ते सघला फोकट गया . // ya // मारा प्राणसरखो तथा जगतमां अनुपम श्राकृतिवालो मारो या घोडो नाश्लाजे मरण पामशे, अने तेथी हुँ खेद पामुं बु. // 70 // त्यारे धम्मिल बोल्यो के हे बुध्विान् ठाकोर ! हुं आनी चेष्टायी धारु बु के गुप्त पापकार्यनीपेठे थाना शरीरमां कईक शल्य जे. // 1 // परी ते चतुर धम्मिले तेज वखते जीतपर जेम चुनो तेम पाणीथी भींजवेली मा. .... टीवडे ते घोडाना शरीरपर लेप को. / / 2 // हवे ते.घोडाने गयामां राख्याथी तेना शरीरना P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust