________________ सार्थ धम्मि- प्यश्रुतां कुर्व-स्तयोरेवं मिथः कथां // रथे सोऽध्ययुनग्वाही / धार्य ध्यायनिजे हृदि // 6 // धम्मिलो रथमारोहुँ / यावच्चक्रे ददौ पदं // तावत्प्राचीचलद्धाला / सारथीन्य सा रथ // 70 // रथं हस्तादमुंचतं / पूपममिवानकं // अनुदनिर्दया चुप-कन्या प्रवयसेन तं // 71 // कूरूप रंक निर्लज्ज / मुंच रे मामकं रथं // लेष्टूनिवाननुक्रोशा-क्रोशानिति जगाद सा // 7 // पास. नान्यस्तसंन्यस्त-संस्कारादिव नात्यजत् // असौ कमां च मौनं च / मान्यपि स्वार्थसिष्ये // 13 // ना मनमां बुच्चा वापरीने घोडानने स्थमा जोड्या. // 65 // पजी रथपर चमवामाटे जेवामां धम्मिले चक्रपर पग दीधो, तेवामां ते कन्याएज सारथी थश्ने रथ चलाव्यो. // 70 // हवे बा. ळक जेम मीगना टुकडाने तेम हाथमाथी रथने नहि गेमता एवा ते धम्मिलने ते निर्दय रा. जकन्या चाबुक मारखा लागी. // 71 // तथा घरे कुरूप! रंक! निर्ला! तुं मारा स्यने नोम? एवी रीते अत्यंत आक्रोशवाळां वचनो कहेवा लागी. // 72 // नजीकमां थान्यस्त करेला सन्या. सीपणाना संस्कारथी जाणे होय नहि तेम मानी जतां पण तेणे स्वार्थसिधिमाटे क्षमा अने | मौन तज्यां नहि. // 13 // हवे ते कमलमुखी कन्याए मार्गे चालतांथकां जोजनवखते थाक न / P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Luncu Aaradhak Taust