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________________ धम्मि- तिके // 64 // ध्रुवं धनगृहे मान्यो / विनीतो विनयावनिः // तदुपायोऽनपायोऽय-मेव लब्धं ध. नश्रियं // 65 // इति जातमतिस्तं स / समानीय खवेश्मनि // कुलदैवतववस्त्र-जूषणाद्यैरपूपु. जत // 66 // लोकेऽत्र दानमेकं हि / वश्यकर्मणि काणं // मातंगमपि सेवंते / दानसक्तं सदाUए० लयः // 6 // नत्वा क्रमदयं तस्य / स बघांजलिरब्रवीत् // वयस्य चेत्प्रसन्नोऽसि / तन्मेलय ध. | वे मने या श्वेत कांतिवाळी स्त्रीनो संग शीरीते थशे? एम विचारतांथकां तेणे तेणीनीपासे न नेला विनीतने जोयो. // 64 // खरेखर था विनयी विनीत धनशेठना घरमां मानीतो माणस . माटे धनश्रीने मेलववामाटे तेज निर्विघ्न नपायरूप जे. // 65 // एवी रीतनी बुछि थवाथी ते कोठवाळे ते विनीतने पोताने घेर बोलावीने कुलदेवीनीपेठे तेनी वस्त्र तथा आभूषणादि| कोथी पूजा करी. // 66 // था जगतमा खरेखर एक दानज वश करवामां कामणसमान ने, के. मके दान (मद) यापनार मातंगने (हाथीने) पण विद्वानोनी श्रेणि (जमरा) हमेशां से. वे . // 67 // पनी तेना बन्ने चरणोने नमीने ते हाथ जोडीने बोल्यो के हे मित्र! जो तं मा। रापर प्रसन्न भयो होय तो धनश्रीनो मेलाप कराव? / / 60 / / ठीक ने एम कहीने ते सघलो वृ. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trusic,
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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