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________________ धम्मि- धनः // 35 // समानयोनी वनवृतवासिनौ / सितबवी व्योमगती ननावपि // तथापि गिति मार्च | निंदितो जनै–र्दिकः पिकस्तु प्रियवागिति स्तुतः / / 36 // वृदायुर्वेदवित्सोऽथ / तथाराममवाल. यत् // गां गोपस्तनयं वप्ता / दलं तांबुलिको यथा // 37 / / सुराझीव प्रजास्तस्मिन् / पालके वि. | पिनडुमाः // बनवुः सततं वरि-फलपुष्पादिसंपदः // 30 // मधुकर्यो वनस्यास्य / दृष्ट्वा नवमिवो. | अवं // जगुर्मगलकारिण्य / श्व ऊंकारदंगतः // 35 // दृष्ट्वा पुष्पफलश्रीणां / वनं सत्रमिव ध्रुवं॥ शी थयो. // 35 // समान जातिवाल, वनवृदोपर रहेनारा, काळा रंगना, तथा आकाशमां गमन करनाग एवा काग घने कोयल बन्ने सरखा बे, तो पण कागडाने दुर्वचनवाो जाणीने लोकोए निंदेलो , तथा कोयलने प्रियवचनवाळी जाणीने तेनी प्रशंसा करेली . // 36 // हवे गो काळ जेम गायनी, पिता जेम पुत्रनी, तथा तंबोली जेम पाननी तेम वृदोसंबंधी थायुर्वेदने जा. णनारा ते समुदत्ते ते बगीचानी मावजत करवा मांमी. // 37 / / नत्तम राजा जेम प्रजानं तेम ते समुद्रदत्त तेनुं पोषण करते बते ते बगीचानां वृदो जत्थाबंध फलपुष्पादिक आपनासं थयां. // 30 // ते वननी एवी रीतनी नवी संपत्ति जोश्ने ऊंकारना मिषधी नमरीन मंगलपाठकनीपेचे | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak. Thus
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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