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________________ धम्मि ति निःशेषतः शिक्षा–सावधाने धने स्थिते // ययावुज्जयिनी श्रेष्टी। प्रयाणैरविलंबितैः मा // स तत्रोत्कंठयायातैः / स्वजनैतिसंगमः // व्याजझो व्याजहारेति / पुत्रं द्वित्रिदिनात्यये | // एए // अहं गिरिपुरे किंचि-न्मुक्त्वा पण्यमिहागमं // विक्रीणते विना लाभं / वस्तु जातु न वाणिजः // 2200 // तहिकेतुं जवांस्तत्र / वत्स गढवतुबधीः // संप्रति प्राप्तकालो य-वस्तुनस्तस्य विक्रयः // 1 // समुडः पितुरादेशा--दचलद्भक्तिनिश्चलः // श्रेष्टिज्ञापितवीवाह-वृत्तैर्मित्रैः प. - एवी रीते सर्व शिदायी ते धनश्रेष्टी सावधान रह्ये ते सागरदत्त शेठ विलंबरहित प्र. याणोथी उज्जयिनीमां गयो. // 7 // त्यां ते उत्कंठाथी बावेला स्वजनो साथे मढ्यो, पजी बे त्रण दिवसो गयावाद मिषना जाणनारा ते शेरे पुत्रने कह्यु के, // एए // हुँ गिरिपुरमां थोडं. क करीयाएं बाकी मेलीने यावेलो बुं, केमके व्यापारी लाभविना वस्तु कदापि पण वेचता नथी. // 2200 // माटे हे वत्स! ते वस्तु वेचवामाटे उत्तम बुध्विाळो तुं त्यां जा? केमके हवे ते वस्तु वेचवानो अवसर जे. // 1 // पजी शे जणावेल ने विवाहवृत्तांत जेनने एवा मित्रो. | सहित जक्तिमां निश्चल समुद्रदत्त पिताना हुकमथी त्यांथी चाल्यो. // 2 // पनी मधुर बाजवा. P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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