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________________ धम्मि- यन् व्यवसायेना-न्यदा प्रास्थित सागरः // 7 // वार्घिसंवर्धितश्रीकं / सुराष्ट्रामंडलं गतः // | चिरं गिरिपुरे स्थित्वा / व्यवसायं परं गतः // 7 // धनेन श्रेष्टिना सत्रा। तत्रानुदस्य सौहृदं // सौरभ्यमिव कस्तूर्या / यीति कदापि न // ए० // नव्यो नरभवात्पुण्य-मिवोपाय॑ धनं धनं U9 | // व्यावृत्तः स ततः प्रोचे / प्रीतिववीधनं धनं // 31 // एकस्थानस्थयोरत्र / नियूढा प्रीतिरावयोः // अथ निन्नाधिकरणा। निर्वोढा सा कथं सखे // ए॥ परं लनेत यद्येषा-अपत्यसंबंधबंधनं // देशांतरप्रते चाल्यो. // 7 // समुज्थी वृधि पामेल लक्ष्मीवाळा सुराष्ट्रदेशमां ते गयो, तथा त्यां गिरिपुरमा लांबो वखत रहीने घणो व्यापार करवा लाग्यो. // 7 // त्यां तेने एक धन नामना शेठसाथे मित्राय थे, के जे मित्राश् कस्तूरीनी सुघंधीनीपेठे कदापि पण कमी थइ नहि. // // ए. // पजी नव्य माणस मनुष्यजवमाथी जेम पुण्यने तेम ते घाणुं धन मेलवीने त्यांथी ज्याः रे ते पागे वन्यो त्यारे तेणे ते धनश्रेष्टिने प्रीतिरूपी वेलने वरसादसरखं वचन कह्यं के, // 7 // वहीं एक जगोए रहेता एवा आपण बन्नेनी प्रीति तो सारी रीते चाली ने, परंतु हे मित्र! हवे | थापण बन्ने ज्यारे जूदा पमशुं त्यारे ते प्रीति शीरीते टकी शकशे ? // ए॥ परंतु जो या प्री PP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036432
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages205
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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