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________________ धम्मि- यौ / / 33 / / इतच कश्चन व्याध--श्वापारोपितसायकः / तत्राजगाम स्वग्रामा-द्वन्यजंतुजिघांस या // 34 // सोऽहृष्यहीदय खेलंतं / सिंधुर सिंधुरोधसि / / दिष्ट्या दृष्टिपथं प्राप्तो / ममायं शकु नेरितः // 35 // हतेऽस्मिन् भजातीये / मुक्तालाजो मम ध्रुवः // अहो जाग्यचरालक्ष्मी-र. ... 101 | द्यायाता स्वयंवरा // 36 // ध्यात्वेति लघुहस्तोऽसौ / विषाक्तं संदधे शरं // स ह्यदिखि भैदो हता. // 3 // एक दिवसे परोढीये ते नदीनी अंदर क्रीमा करवानी चाथी धनवान जेम पो. ताना महेलमांथी तेम धीमी गतिथी कामीमांथी बहार निकल्यो. // 33 // एवामां धनुष्यपर बाण. चडावीने कोश्क पाराधि पोताना गाममांथी त्यां वनवासी पशुनने माखानी बाथी श्राव्यो. // // 34 // ते त्यां नदीकिनारे ते हाथीने क्रीडा करतो जोस्ने खुशीथी विचारवा लाग्यो के अ. हो! अाज तो सारं थयु के शुभ शकुनने प्रतापे मने या हाथी नजरे पंड्यो . // 35 // खरेखर याद्रजातिना हाथीने मारवाथी मने मोतीननो लान थशे, अहो! बाजे तो जाग्यने लीधे मने लक्ष्मी पोतानी मेळेज वखा यावेली . // 36 // एम विचारीने हायचालाकी यी ते. . | ले फेरी बाण सांध्यु, केमके ते हाथी पर्वतनीमाफक बीनां घणां बाणोवडे करीने पण मरी शके | .. P.P.AC.Gunratnasuri M.S.. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036431
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages176
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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