________________ धम्मि- वः // 17 // प्रम्लानवदनं दुःख–सदनं वीक्ष्य सकृपः // ऋषिः कोऽपि किमेवं भो। रोदिषीति तमालपत् // 20 // स्ववृत्तनिहिते विप्रेणाधिव्याधिमहौषधी // वाचमूचे मुनिन्द्र / मा रोदी घेहि धीरतां // 21 / / कस्य लक्ष्मी सुताः कस्य / कस्य वेश्मेति चिंतय // नदेति याति चात्मा 170 य-मेक एव जवाद्भवं // 22 // स्वदृश्चिकूणनाध्योम्नि / विचंद्रों वीदयते यथा // तत्तत्साम्यं दध. | त्यामा / स्वमनःकल्पनात्तथा // 23 // विना जिनाधिपं सर्वे-गिनः स्वार्थैकहनाः // यस्तेषु प्रेएवी रीते अत्यंत शोकातुर चहेरावाळा तथा दुःखना घरसरखा ते ब्राह्मणने त्यां जोश्ने कोक मुनिए कहां के, अरे तुं शामाटे रडे बे ? // 20 // त्यारे ते ब्राह्मणे पोतानुं वृत्तांत कह्याबाद मु. नि तेनी थाधिव्याधि दूर करवाने महान औषधीसरखी वाणी बोल्या के, हे भद्र ! तुं रड नाहि अने धैर्य राख? // 51 // कोनी लक्ष्मी ? कोना पुत्रो? अने कोर्नु घर ? ए सघg तुं विचार? या आत्मा तो एकलोज एक नवमांथी वीजा नवमां जाय . // 25 // पोतानी यांखो संकोच | वाथी आकाशमां जेम बे चंडो देखाय , तेम पोताना मननी कल्पनाथी अात्मा ते ते तुल्यप . | पाने धारण करे . // 23 // जिनेश्वरविना सर्व प्राणीने फक्त स्वार्थमांज लीन थयेला ने, माटे | P.P. Ac, Guntainguri M.S. Jun Gundararak Trust