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________________ सार्थ धम्मि- // 65 // योगिना दर्शितं तत्र / प्रासादं प्राविशद् हिजः // निधूमवर्तिदीपाय-माननानामणीमयं / / 66 / / योग्यूचे चो मां देवीं / विधि सिरसेश्वरीं // एतां प्रसाद्य सद्यस्वं / हेमाई रसमा. प्नुहि // 67 // 165 सोऽपि सन्निहिताराम-पुष्पैरन्यर्च्य देवता // पुरो बघांजलिः काव्यै--नव्यैरस्तु. | त तन्मनाः // 67 // सुरी परीदितुं तस्य / जतिं जक्तेषु वत्सला // वत्स तुष्टास्मि किंचित्त्वं / पा. | र्ग जोताथका तेज बन्ने एक रसकूपिकापासे याव्या. / / 65 // त्यां योगीए देखाडेला अने धू. माडा तथा वाटविनाना दीपकरूप थयेल ने विविधप्रकारना मणिन जेमां एवा एक मंदिरमा ते ब्राह्मण दाखल थयो. // 66 // पनी योगीए तेने कर्जा के हे विज या देवीने तुं सिघरसनी मा. लिक जाणजे, तेणीने खुशी करवाथी तने सुवर्णयोग्य रस जलदी मळशे. // 67 // . पजी ते ब्राह्मण पण नजदीक रहेला बगीचाना पुष्पोथी ते देवीने पूजीने तथा तेणीनीपा. से हाथ जोडीने तल्लीन थश्ने नवां काव्यो वडे स्तुति करवा लाग्यो. // 67 // ते वखते पोता. | ना नक्तोपते वत्सल एवी ते देवी तेनी नक्तिनी परीदा करवामाटे बोली के हे वत्स ! हुं ताराप्रः | Jun Gun Aaradhak Trust P.P.AC.Gunratnasuri M.S.
SR No.036430
Book TitleDhamil Charitra Bhashantar Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Hiralal Hansraj
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1914
Total Pages173
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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