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________________ चरित्रम् हृष्टोऽथो दनुजारी-स्ततः समागत्य समवसरणभुवं / जिनमानम्यात्मदृशं / ददौ मुदा: साधुवरपंक्तौ देवकीपुत्र ___ अर्थः-पछी आनंदित थयेला ते श्रीकृष्णसमवसरणमां आवीने, तथा प्रभुने वांदीने हर्षथी उत्तम साधुओनी. श्रेणी तरफ दृष्टि करवा लाग्या // 41 // गजसुकुमालमपश्यन् / मुनीश्वरं निजसहोदरं शौरिः // किंचिच्चक्तिश्चित्ते / जिनेश्वरं प्रांजलिः प्रोचे // 4 // .. अर्थः-परंतु त्या पोताना भाइ एवा ते गजसुकुमालमुनिने नहीं जोवाथी मनमां कईक चकीत थयेला श्रीMool कृष्णे हाथजोडीने प्रभुने पूछयु के, // 42 // यः प्रवजितः स्वामिन्। कमेऽनुजः सकलसाधुतिलकसमः // इत्युदिते भगवानपि / जगाद संदेहवनवतिः 10 अर्थ:-हे स्वामीन् ! सर्व साधुओमां तिलकसमान, अने गइ कालेज जेमणे दीक्षा लीघेली छे, एवा ते महारा eceDESSEE // 6 // SECSSESite Iccelec886GSSSB प्रभुपण बोल्या के, // 43 // शौरे शृणु साधुरयं / गत्वा यः पितृवनं महाघोर // कायोत्सर्गे सायं / स्थितोऽस्मदादेशतस्तुणे // 4 // . अर्थ:-हे कृष्ण ! तमो सांभळो? ते मुनि गइकालेज अतिभयंकर श्मशानमा संध्याकाळे जइने अमारा आदेशमुजब तुरत कायोत्सर्मध्यानमां स्थिर स्था. // 44 // . Jun Gum Aatach
SR No.036429
Book TitleDevki Putra Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShubhvardhan Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1934
Total Pages41
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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