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________________ पृष्ठम् पङ्क्तिः अशुद्धम् शुद्धम् पृष्ठम् परक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् 126 // 8 // 2 कृत्यता 143 144 5 को घ० पूद्गः० 129 कृत्यां कर्मोघ० पूदग० ०पक्षमा० नैभि नग्तरं निषिद्वं सडखयाका जीविका पत्रण 5 व्यश्चेत्ये कोऽपि लम्भयन्ति सिद्धिभावः दर्शन लिङ्गेषु ०वर्ग परामा नैमि नन्तरं निषिद्धं सखयाका जीवका व्यश्चत्ये० कर्कोऽपि लम्भ्यन्ति सिद्धिमावः दशनं० लिङ्गषु ०वग ०काय थाधर० 147 . 2 147 13 148 2 151 11 152 2 154 2 15 कार्य थापर० पत्र मह महा ज्ञाणं 156 10 135 15 133 15 134 16 160 11 136 खारिका० लत्वात्त जिगे. हेमया रागद्वे दुःस्वा झाण खासिका. ०त्वात्तत् जिने हेममया० रागद्वेष० दुःखा साक्षित्वा० त्वस्वीका० पसेसु नश्येश्रे० दुर्लम त्रीण्येयेतानि चयः साक्षिकत्वा० ०त्वस्वीका० पत्तेसु नश्येच्चे दुर्लभ त्रीण्येतानि चयः // 8 // 137 139 142 5 163 5 P.P. Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036409
Book TitleAgamoddharak Kruti Sandohasya Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManikyasagarsuri
PublisherMithabhai Kalyanchandji Pedhi
Publication Year1965
Total Pages193
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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