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________________ 116 ] [ तर्कसंग्रहः 4. कर्मादिशेषपदार्थलक्षणप्रकरणम् [ कर्मणः किं लक्षणम् ? ] चलनात्मकं कर्म / ऊर्ध्वदेशसंयोगहेतुरुत्क्षेपणम् / अधोदेशसंयोगहेतुरपक्षेपणम् / शरीरस्य सनिकृष्टसंयोगहेतुराकुश्चनम् / विप्रकृष्टसंयोगहेतुः प्रसारणम् / अन्यत्सर्व गमनम् / (पृथिव्यादिचतुष्टयमनोमात्रवृत्ति)। अनुवाद-[कर्म का क्या लक्षण है ? ] चलनात्मक (चलन, कम्पन, स्पन्दन आदि क्रियायें ) कर्म है। ऊर्ध्वदेश के साथ संयोग का हेतु उत्क्षेपण है। अधोदेश के साथ संयोग का हेतू अपक्षेपण है। शरीर के समीप संयोग का कारण आकञ्चन है। शरीर से दूर संयोग का कारण प्रसारण है। अन्य सब गमन है। (पृथिव्यादि चार तथा मन में ये रहते हैं। व्याख्या--'उत्तरदेशसंयोगानुकूलव्यापारत्वं गमनत्वम्' उत्तरदेश से संयोग के अनुकूल व्यापार को गमन कहते हैं / गमन में उत्क्षेपणादि से भिन्न समस्त क्रियायें समाहित हैं। विशेष के लिए देखिए पृष्ठ 8 से 9. [सामान्यस्य किं लक्षणम् ?] नित्यमेकमनेकाऽनुगतं सामान्यम् / द्रव्यगुणकर्मवृत्ति / तद् द्विविधं पराऽपरभेदात् / / परं सत्ता / अपरं द्रव्यत्वादि। अनुवाद-[सामान्य का क्या लक्षण है ? ] जो नित्य और एक होकर अनेकों में अनुगत रहे वह सामान्य है। वह द्रव्य, गुण और . कर्म में रहता है। पर और अपर के भेद से वह दो प्रकार का है। . पर सत्ता द्रव्य, गुण और कर्म में रहने वाला सामान्य है। अपर द्रव्यत्व ( सत्ता की अपेक्षा अल्प देश वृत्ति) आदि हैं। व्याख्या- देखिए पृष्ठ 9 से 11. कर्म-सामान्य-विशेष-समवायाः ] [117 [विशेषाणां किं लक्षणम् ? 1 नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषाः / ___ अनुवाद-[विशेषों का क्या लक्षण है ?] नित्य द्रव्यों में रहने वाले व्यावर्तकों (नित्य द्रव्यों के भेदक तत्त्वों को) विशेष कहते हैं। व्याख्या-विशेषों के लक्षण में 'आत्मत्वमनस्त्वभिन्नाः' इस पद को भी जोड़ देना चाहिए अन्यथा आत्मत्व और मनस्त्व में लक्षण अतिव्याप्त होगा क्योंकि आत्मत्व और मनस्त्व ये दोनों जातियाँ नित्यद्रव्यवृत्ति हैं तथा पृथिवीत्व आदि की व्यावर्तक भी हैं। विस्तार के लिए देखिए पृष्ठ 11-12. [समवायस्य किं लक्षणम् ? 1 नित्यसम्बन्धः समवायः। अयुतसिद्धवृत्तिः। ययोयोर्मध्ये एकमविनश्यद् ( अवस्थम् ) अपराश्रितभेवाऽवतितिष्ठते तावयुतसिद्धौ / यथा अवयवाऽवय• विनो, गुण-गुणिनी, क्रिया-कियावन्तौ, जाति-व्यक्ती, विशेषनित्यद्रव्ये चेति / अनुवाब-[समवाय का क्या लक्षण है?] नित्य सम्बन्ध समवाय है। वह अयुतसिद्ध पदार्थों में रहता है। जिन दो के बीच में एक (अवस्था) जब तक नष्ट न हो जाए तब तक दूसरे के आश्रित ही रहे वे दोनों अयुतसिद्ध होते हैं। जैसे अवयव और अव. यवी, गुण और गुणो, क्रिया और क्रियावान्, जाति और व्यक्ति एवं विशेष और नित्यद्रव्य / व्याख्या-'स्वरूपसम्बन्धभिन्नत्वे सति नित्यसम्बन्धत्वं समवायत्वम्' ऐसा लक्षण समवाय का करना चाहिए जिससे स्वरूपसम्बन्ध में अतिव्याप्ति न हो। घट (अवयवी ) जब रहेगा तो कपाल ( अबयव) में ही रहेगा, अतः वे दोनों अयुतसिद्ध हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिए। विशेष के लिए देखिए पृष्ठ 12-13.
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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