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________________ उपमानशब्दप्रमाणे ] [ 101 100 ] [ तर्कसंग्रहः शक्तं पदम् / अस्मात्पदादयमों बोद्धव्य इतीश्वरसङ्केतः उपमान है। अन्नम्भट्ट ने उपमान को प्रमाण मानकर गौतम के मत का अनुसरण किया है। वैशेषिक और सांख्य उपमान का अनुमान में शक्तिः / अन्तर्भाव मानते हैं / जैसे-'अयं पिण्डो गवयपदवाच्यः, गोसादृश्यात् / / अनुवाब-[शब्दप्रमाण का क्या स्वरूप है?] आप्तपुरुष के यत्र यत्र गोसादृश्य तत्र तत्र गवयपदवाच्यत्वम्' परन्तु इसे अनुमान वाक्य को शब्द प्रमाण कहते हैं / सत्यवक्ता को आप्त कहते हैं / पदों के मानना ठीक नहीं है क्योंकि इस ज्ञान के बाद 'उपमिनोमि' ऐसा समूह को वाक्य कहते हैं, जैसे- गाय को लाओ'। जिसमें शक्ति हो अनुव्यवसाय होता है, न कि 'अनुमिनोमि' ऐसा अनुव्यवसाय। / उसे पद कहते हैं। इस पद से यह अर्थ जानना चाहिए' यह जो उपमान तीन प्रकार का मामा जाता है-(१)सादृश्य- ईश्वर का संकेत है, वही शक्ति है। विशिष्टपिण्डज्ञान (सादृश्य द्वारा ज्ञान), जैसे--'गोसदृशो गवयः' यहाँ व्याख्या-'आप्तवाक्यं शब्दः' आप्तपुरुष- यथार्थवक्ता के पद जान करण है। (2) वैधर्म्यविशिष्टपिण्डज्ञान' समूहात्मक वाक्य को शब्द प्रमाण कहते हैं। वञ्चक एवं भ्रान्त वाक्य (वैधर्म्य द्वारा ज्ञान), जैसे--ऊँट कैसा होता है ? ऐसा पूछने पर 'उष्ट्रो / में अतिव्याप्ति रोकने के लिए 'आप्त' पद दिया है। यदि वक्ता नाश्वादिवत्समानपृष्ठहस्वग्रीवशरीरः' (जो घोड़े के समान पीठ वाला प्रामाणिक है तो उसका वचन भी प्रामाणिक है। आप्त के गामानय नहीं है तथा जिसकी ग्रीवा और शरीर बौना नहीं है वह ऊट है), (गाय को लाओ) इत्यादि वाक्य से होने वाला ज्ञान शाब्दप्रमा है तवचन से कालान्तर में 'असौ उष्ट्रपदवाच्यः' (यह ऊट . और शाब्दी प्रमा का जनक आप्तवाक्य ही शब्द प्रमाण है। अतः आगे शब्द का अर्थ है ) ऐसी उपमिति होती है। इस तरह यहाँ वैधर्म्य- कहा है 'वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानम् / तत्करणं शब्दः' वाक्यार्थ के ज्ञान विशिष्ट विज्ञान करण है। / 3) असाधारणधर्मविशिष्टापण्ड- को शाब्दज्ञान तथा उसके करण शब्द को शब्द प्रमाण कहते हैं / ज्ञान ( असाधारण धर्म द्वारा ज्ञान), जैसे--खड्गमृग (गैडा) कैसा परन्तु न्यायबोधिनीकार वस्तुतस्तु के द्वारा अपना मत प्रकट करते होता है? ऐसा पछने पर 'नासिकालसदेकशृङ्गोऽनतिक्रान्तगजा है-'पदज्ञानं करणम्। वृत्तिज्ञानमहकृतपदज्ञानजन्यपदार्थोपस्थितिकतिश्च' (नाक में एक सींग वाला तथा हाथी के आकार का व्यापारः / वाक्यार्थज्ञानं शाब्दबोधः फलम् / वत्तिर्नाम शक्तिलक्षणाअतिक्रमण न करने वाला गैंडा होता है) इस आप्तवचन से कालान्तर न्यतररूपा' (पदज्ञान करण है। वृत्तिज्ञान से सहकृत पदज्ञानजन्य में खडगमगपदवाच्योऽसौ' (यह गैंडा पदवाच्य है) ऐसी उपमिति पदार्थोपस्थिति व्यापार है। वाक्यार्थज्ञान शाब्दबोधरूप फल है। वत्ति होती है। इस तरह यहाँ असाधारणधर्म से विशिष्टपिण्डज्ञान का अर्थ है शक्ति और लक्षणा में से कोई एक')। यह विषय गम्भीर करण है। है तथा इस सन्दर्भ में विभिन्न दार्शनिकों में मतभेद पाया जाता [उपमान प्रमाण परिच्छेद समाप्त ] .. है। विषय को सुबोध बनाने के लिए संक्षेप में यहाँ निर्वचन करेंगे प्रश्न-वाक्य किसे कहते है ? (घ) अथ शब्दप्रमाणपरिच्छेदः [शब्दप्रमाणस्य किं स्वरूपम् ? ] आप्तवाक्यं शब्दः। उतर-पदसमूह को वाक्य कहते हैं / सामान्यतः जिसके अन्त में आप्तस्तु यथाथेवक्ता। वाक्यं पदसमूहः, यथा गामानयेति। पुप या तिङ्क विभाक जुडी हो उसे पद कहते हैं सूप्तिङन्तं पदम'।
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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