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________________ उपमानप्रमाणम् ] 98] [ तर्कसंग्रहः हेत्वाभास होता है। जैसे-'वह्निरनुष्णः' में आग की अनुष्णता (शीतलता ) स्पार्शन प्रत्यक्ष से बाधित है क्योंकि स्पार्शन प्रत्यक्ष से आग की उष्णता ज्ञात है। सत्प्रतिपक्ष में तुल्यबल वाला दूसरा अनुमान प्रस्तुत किया जाता है, यहाँ ऐसा नहीं है। बाधित को कालात्ययापदिष्ट भी कहा जाता है। प्रश्न-किस हेत्वाभास से क्या प्रतिबन्धित होता है ? उत्तर-दीपिका टीका में बतलाया है कि साध्याभाव का निश्चय कराने के कारण बाधित तथा विरोधी ज्ञान कराने के कारण सत्प्रतिपक्ष अनुमिति में साक्षात् प्रतिबन्धक हैं, शेष परामर्श में / इनमें भी साधारण, विरुद्ध तथा व्याप्यत्वासिद्ध व्याप्तिज्ञान मैं, आश्रयासिद्ध तथा:स्वरूपासिद्ध पक्षधर्मताज्ञान में प्रतिबन्धक हैं। व्यभिचारज्ञान के द्वारा उपाधि भी व्याप्तिज्ञान में प्रतिबन्धक है। [ अनुमान प्रमाण परिच्छेद समाप्त ] (ग) अथोपमानप्रमाणपरिच्छेदः [उपमानप्रमाणस्य किं लक्षणम् , उपमितिश्च का ? ] उपमितिकरणमुपमानम् / संज्ञा-संज्ञिसंबन्धज्ञानमुपमितिः / तत्करणं सादृश्यज्ञानम् / अतिदेशवाक्यार्थस्मरणमवान्तरव्यापारः / तथाहि-कश्चिद् गवयशब्दवाच्य( पदार्थ )-मजानन् कतश्चिदारण्यकपुरुषात 'गोसदृशो गवय इति श्रुत्वा वन गता वाक्पार्थ स्मरन् गोसदृशं पिण्डं पश्यति / तदनन्तरं 'असौ (अयम् ) गवयशब्दवाच्य' इत्युपमितिरुत्पद्यते / / अनुवाद-[ उपमान का क्या लक्षण है तथा उपमिति का क्या स्वरूप है? ] उपमिति के करण को उपमान कहते हैं। संज्ञा और संज्ञी (पद और पदार्थ) के सम्बन्ध का ज्ञान उपमिति है। उस उपमिति का करण है 'सादृश्यज्ञान'। प्रामाणिक व्यक्ति के द्वारा कहे हुए वाक्य के अर्थ का स्मरण है 'अवान्तर व्यापार' / जैसे-कोई *गवय' शब्द के अर्थ को न जानता हआ किसी बनेचर पुरुष से 'गवय गाय के समान होता है' ऐसा सुनकर बन में गया और वहां उस वाक्य के अर्थ का स्मरण करता हुआ गाय के समान किसी [शरीर] पिण्ड को देखता है, पश्चात् 'यह गवय शब्द का वाच्य है' ऐसी उपमिति उत्पन्न होती है। * व्याख्या-'उपमिति' का कारण है 'उपमान' / संज्ञा-संज्ञी ( पद और पदार्थ) के सम्बन्ध का ज्ञान है 'उपमिति', सादृश्यज्ञान (सादृश्यविशिष्टपिण्डज्ञान) है 'करण', 'अतिदेशवाक्यार्थस्मरण' है 'व्यापार तथा इसका फल है 'उपमिति' / उपमिति-'संज्ञा-संज्ञिसम्बन्धज्ञानमुपमितिः' संज्ञा (पद) और संज्ञी (पदार्थ) के वाच्यवाचक भावरूप सम्बन्ध का ज्ञान है उपमिति। यदि 'संज्ञा-संज्ञिज्ञान' को उपमिति कहेंगे तो अनुमिति आदि में अतिव्याप्ति होगी क्योंकि उनसे भी संज्ञा-संज्ञी का ज्ञान होता है। अतः संज्ञासंज्ञि-सम्बन्धज्ञान को उपमिति कहा गया है। यहाँ 'अभिप्रेत गवय गवयपद वाच्य है' ऐसा शक्तिग्रह होने से गवयान्तर में अतिव्याप्ति नहीं होगी। इस उपमिति का करण है सादृश्यज्ञान / "जैसे-गवय को न जानने वाला कोई व्यक्ति किसी प्रामाणिक | वनवासी से 'गोसदृशो गवयः' (गाय के समान गवय होता है) ऐसा सुनकर वन में जाता है और जब उसे वहाँ गाय के सदश एक जुगली पशु दिखलाई पड़ता है तो वह वहाँ उस वनवासी के पर्व में कई गये वचन (अतिदेशवाक्य-गोसदशी गवयः' इस पद का) का स्मरण करता है। पश्चात् उस स्मरण को प्रत्यक्ष गवय से सम्बन्धित करके कहता है 'असौ गवयशब्दवाच्यः' (यह गवय है)। यही उपमिति है। उपमिति के लिए अतिदेशवाक्यार्थ का स्मरण और सदृश पदार्थ का प्रत्यक्ष आवश्यक है। उपमान-'उपमितिकरणमुपमानम्' उपमिति का करण उपमान ।है। उपमिति का करण है 'सादृश्यज्ञान' अर्थात् सादृश्यज्ञान ही
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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