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________________ [ तर्कसंग्रहः जिसके असमवायिकारण का विचार हो रहा हो वह कार्य अपने असमबायिकारण के साथ एक अधिकरण में रहे। जैसे-पट कार्य का असमवायिकारण तन्तुसंयोग है जो तन्तुसंयोग अपने अधिकरण तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है। पट कार्य भी अपने समवायिकारण तन्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहता है। इस तरह इस उदाहरण में 'तन्तु' पट कार्य का तथा तन्तुसंयोग ( असमवायिकारण ) का एकाधिकरण है। अतः तन्तुसंयोग पट कार्य के प्रति असमवायिकारण है। इसी तरह घट कार्य का असमवायिकारण कपालद्वय-संयोग तथा घट कार्य ये दोनों समवायिकारण कपालदूयरूप एक ही अधिकरण में रहते हैं, अतः कपालद्वय-संयोग घट के प्रति असमवायिकारण है। (ख) कारणकाथप्रत्यासत्ति-जो असमवायिकारण अपने कार्य के समवायिकरण के साथ एक अधिकरण में रहता हो अर्थात् कार्येकार्थप्रत्यासत्ति में तो असमवायिकारण और कार्य दोनों एक साथ एक स्थान में रहते हैं जबकि कारणकार्थप्रत्यासत्ति में असमवायिकारण तथा कार्य का समवायिकारण दोनों एक साथ एक स्थान में रहते हैं। जैसे-पटरूप कार्य के प्रति तन्तुरूप असमवायिकारण है तथा पट समवायिकारण है। इस उदाहरण में तन्तुरूप असमवायिकारण का अधिकरण तन्तु है तथा पटरूप कार्य के समवायिकारण का अधिकरण भी तन्तु है / इसी प्रकार घटरूप कार्य का असमवायिकारण कपालद्वयरूप का अधिकरण कपालद्वय है तथा घटरूप कार्य के समवाविकारण का अधिकरण भी कपालद्वय है। अतः यहाँ कारणैकार्थप्रत्यासत्ति है। चूंकि आत्मा के विशेषगुण कहीं भी असमवायिकारण नहीं माने जाते हैं, अतः लक्षण में 'आत्मविशेषगुणभिन्नत्वे सति' पद जोड़ देना चाहिए। (ग) निमित्तकारण-'तदुभयभिन्न कारणं निमित्तकारणम्' अर्थात् . समवायिकारण और असमवायिकारण से भिन्न सभी कारण निमित्त कारणस्य प्रत्यक्षप्रमाणस्य च लक्षणे ] [59 कारण हैं / जैसे-तुरी, वेमा आदि पट के प्रति तथा दण्ड, चक्र आदि घट के प्रति निमित्तकारण हैं। निमित्तकारण दो प्रकार के हैंसामान्य निमित्तकारण और विशेष निमित्तकारण / सामान्यकारण वे हैं जो सभी कार्यों के प्रति समानरूप से कारण होते हैं। ऐसे कारण संख्या में आठ-ईश्वर, ईश्वर का ज्ञान, कृति, दिशा, काल, आकाश, इच्छा, प्रांगभावः। विशेष निमित्तकारण अनेक हैं। तुरी, वेमा, जुलाहा आदि विशेष निमित्तकारण हैं। कारण विचार के प्रसङ्ग में इन्हीं निमित्तकारणों का विचार अपेक्षित होता है। [करणस्य निष्कृष्टलक्षणं किम् ? ] तदेतत्रिविधकारणमध्ये यदसाधारणं कारणं तदेव करणम् / अनुवाद-[ करण का निष्कृष्ट लक्षण क्या है ? ] इन तीनों कारणों ( समवायि, असमधायि और निमित्त ) में जो असाधारण कारण हो वही करण कहलाता है। व्याख्या -- इसका विचार पहले किया जा चुका है। (क) अथ प्रत्यक्षप्रमाणपरिच्छेदः [प्रत्यक्षप्रमाणस्य किं लक्षणम् ? ] तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम् / अनुवाद-[प्रत्यक्ष प्रमाण का क्या लक्षण है ? ] उनमें (पूर्वोक्त चार प्रमाणों में प्रत्यक्षज्ञान के करण (व्यापारयुक्त असाधारण कारण ) को प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। अर्थात् चक्ष आदि इद्रियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। व्याख्या-'प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्' इस परिभाषा में प्रथम प्रत्यक्ष शब्द प्रत्यक्षात्मक ज्ञान का तथा द्वितीय प्रत्यक्ष शब्द प्रत्यक्ष प्रमाण का वाचक है। यदि 'प्रत्यक्षकरणम्' मात्र लक्षण करते तो प्रत्यक्षकरण दण्डादि में अतिव्याप्ति हो जाती। यदि 'शानकरणम् -
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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