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________________ करण-कारण-कार्यलक्षणानि ] [51 50] [ तर्कसंग्रहः विशेष (असाधारण करण) करण नहीं कहलाते हैं / न्यायबोधिनीकार आदि प्राचीन नैयायिक करण का व्यापारवान् भी होना आवश्यक मानते हैं और तदनुसार करण का लक्षण होगा 'व्यापारवदसाधारण कारणं करणम्' ( व्यापार - क्रिया वाला होते हुए जो कार्योत्पत्ति के प्रति असाधारण कारण हो वह करण है ) / तर्कसंग्रह की कुछ प्रतियों के मूल में ऐसा भी लक्षण मिलता है। जैसे- 'दण्ड' घट का असाधारण निमित्तकारण है और वह चक्र-भ्रमी रूप व्यापारवान् भी है। ज्ञान के प्रति इन्द्रियाँ करण हैं क्योंकि उनमें सन्निकर्षरूप व्यापार है। यदि व्यापार को आवश्यक नहीं माना जायेगा। (जैसा कि नव्यनैयायिक मानते हैं ) तो इन्द्रियार्थसन्निकर्ष करण हो . जायेगा। नव्यनैयायिकों के अनुसार 'करण' का लक्षण है-'फलायोगव्यवच्छिन्न कारणं करणम्' फल के अयोग ( अभाव ) का अभाव (व्यवच्छिन्न) जिस कारण में हो वह करण है अथवा 'अविलम्बेन कार्योत्पादकत्व' जिसमें हो वह करण है / इसका तात्पर्य है 'जिसके तुरन्त बाद कार्योत्पन्न हो अथवा कार्योत्पत्ति के अव्यवहित पूर्ववर्ती कारण को करण कहते हैं।' यहाँ करण को व्यापारवान् होना आवश्यक नहीं है अपितु व्यापार ही करण है। इस लक्षण- . भेद का फल यह हुआ कि प्रत्यक्ष ज्ञान के प्रति प्राचीन नैयायिकों के अनुसार इन्द्रियाँ करण हैं और इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष व्यापार जबकि नवीन नैयायिकों के अनुसार इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष ही करण , है। इसी तरह अनुमिति में प्राचीन नैयायिकों के अनुसार लिङ्गज्ञान ( व्याप्तिज्ञान ) करण है जबकि नवीन नैयायिकों के अनुसार लिङ्ग-परामर्श करण है। कारण-विचार-कारण को निश्चय ही कार्य से पूर्ववर्ती होना चाहिए अन्यथा वह कारण नहीं हो सकता है परन्तु कार्य की उत्पत्ति से पूर्ववर्ती सभी पदार्थ कारण नहीं हो सकते हैं। अतः लक्षण में नियत. पूर्ववर्ती कहा गया है / 'नियतपूर्ववृत्तित्व' का अर्थ है-'अव्यवहित पूर्वकालावच्छेदेन कार्यदेशे सत्त्वम्' कार्यस्थल में कार्योत्पत्ति के अव्यवहित पूर्ववर्ती काल में नियतरूप से उपस्थित रहना। इस तरह कुम्भकार का पिता, वनस्थ दण्ड, गधा, बैलगाड़ी आदि घटरूप कार्य के प्रति कारण नहीं हो सकते हैं क्योंकि ये पूर्ववर्ती तो हैं परन्तु नियत-पूर्ववर्ती नहीं हैं। ये कभी रहते हैं, कभी नहीं भी रहते हैं। इनके रहने और न रहने से कार्योत्पत्ति पर कोई असर नहीं पड़ता है। ___ इन्हें कार्योत्पत्ति के प्रति अन्ययासिद्ध ( कार्य में अनुपयोगी होकर कार्यदेश में रहना) कहा जाता है। इस लक्षण में एक दोष है कि दण्डरूप और दण्डत्व जाति आदि जो कार्योत्पत्ति के प्रति अन्यथासिद्ध हैं वे कार्यनियतपूर्ववति होने से कारण कहलाने लगेंगे। अतः इस अतिव्याप्ति दोष को दूर करने के लिए लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' (अन्यथासिद्ध का उल्टा) पद जोड़ना होगा और तदनुसार कारण का लक्षण होगा 'अनन्यथासिद्धत्वे सति कार्यनियतपूर्ववृत्तित्वं कारणत्वम्'। इस तरह दण्ड के साथ रहने वाली दण्डत्व जाति आदि का वारण हो जाता है। दीपिका टीका में तीन प्रयोजक अन्यथासिद्ध के बतलाये हैं। जैसे—(१) कारण के साथ समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध दण्डत्व और दण्ड रूप, (2) जिनका पूर्ववतित्व अन्य के पूर्ववर्तित्व की अपेक्षा रखता हो, ऐसे आकाशादि तथा कुम्भकार का पिता (शब्द के प्रति आकाश की पूर्ववतिता मिद्ध है उसे लेकर आकाश की पूर्ववर्तिता तथा कुम्भकार से पहले रहने वाला उसका पिता), (3) * अन्य कारण के साथ समवाय सम्बन्ध से अतिरिक्त सम्बन्ध से रहने वाले तत्त्व रासभ आदि तथा पाकज गुणोत्पत्ति के स्थल में रूप के प्रति रस का प्रागभाव / नैयायिकों के अनुमार कार्य के प्रति कार्य का प्रागभाव भी कारण माना जाता है। जैसे घट कार्य के प्रति घट का प्रागभाव भी कारण है। इसी प्रकार जब पाकज रूप, रसादि गुणों की उत्पत्ति होती है तो कार्य-रूप के प्रति कार्य-रूप का प्रागभाग, कार्य-रस के प्रति कार्य-रस का प्रागभाव कारण होता है। रूप के प्रति रस का प्रागभाव और रस के प्रति रूप का प्रागभाव कारण
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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