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________________ गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्दलक्षणानि ] [43 42] [ तर्कसंग्रहः व्याख्या-परत्वापरत्व को दूरी और निकटता शब्दों से कहा जा सकता है। ये दोनों मूर्त द्रव्यों के दिक्कृत और कालकृत सम्बन्ध हैं जिन्हें उनके गुण के रूप में कहा गया है। कालिक परत्वापरत्व मन में नहीं रहता है क्योंकि मन को नित्य माना है, अतः कालकृत ज्येष्ठता एवं कनिष्ठता संभव नहीं है / शेष चार पृथिव्यादि अनित्य मूर्त द्रव्यों में दैशिक एवं कालिक परत्वापरत्व है। ये परत्वापरत्व संयोगादि की तरह अपेक्षाबुद्धिजन्य ( सापेक्ष ) हैं। अतः एक ही / / द्रव्य में अपेक्षावुद्धि से परत्वापरत्व दोनों रह सकते हैं। [12. गुरुत्वस्य किं लक्षणम् ? ] आद्यपतनासमवायिकारणं गुरुत्वम् / पृथिवीजलवृत्ति / अनुवाद-[१२. गुरुत्व का क्या लक्षण है ? ] प्रथम पतन (गिरने) का असमवायिकारणभूत जो गुण है वह है गुरुत्व (भारीपन)। वह पृथिवी और जल में रहता है। व्याख्या लक्षण में यदि 'आद्य' पद न देते तो वेग में अतिव्याप्ति होती क्योंकि द्वितीय आदि पतन में 'वेग' असमवायिकारण होता है। आद्यपतन के कारण दण्डादि में अतिव्याप्तिवारण के लिए असमवायिपद दिया है क्योंकि दण्ड द्रव्य होने से समवायिकरण है। रूप आदि असमवायिकारण में अतिव्याप्ति रोकने के लिए 'पतन' पद / / दिया है। पूर्ववत् गुरुत्व का पूर्ण लक्षण होगा-'आद्यपतनाऽसमवायिकारणत्वे सति गुणत्व गुरुत्वम् / ' गुरुत्व अतीन्द्रिय है / तराजू के नमन तथा उन्नमन से गुरुत्व का अनुमान होता है। [13. द्रवत्वस्य कि लक्षणं, के च भेदाः 1 ] आद्यस्यन्दनाऽसमवायिकारणं द्रवत्वम् / पृथिव्यप्तेजोवृत्ति / तद् द्विविधं-सांसिद्धिक नैमित्तिकं च / सांसिद्धिकं जले, नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः / पृथिव्यां घृतादावग्निसंयोगजं द्रवत्वं, तेजसि सुवर्णादौ। अनुवाद-[१३. द्रवत्व का क्या लक्षण है और उसके कितने भेद हैं ? ] आद्यस्यन्दन ( बहना या टबकना) का असमवायिकारण द्रवत्व है। वह पृथिवी, जल और तेज में रहता है। वह द्रवत्व दो प्रकार का है-सांसिद्धिक (स्वाभाविक ) और नैमित्तिक (अग्नि आदि तेज के संयोग से होने वाला)। सांसिद्धिक द्रवत्व जल में है। नैमित्तिक द्रवत्व पृथिवी और तेज में है।.पार्थिव घी आदि ( मोम अ दि) में तथा तैजस सुवर्णादि ( रजत आदि) में अग्नि के संयोग से नैमित्तिकद्रवत्व है। व्याख्या-गुरुत्व के समान इसका भी पूर्ण लक्षण होगा 'आद्यस्यन्दनाऽसमवायिकारणत्वे सति गुणत्वम् द्रवत्वम्' / 'आद्य' पद बेद' मैं अतिव्याप्तिवारण के लिए है। द्वितीय तथा परबर्ती स्यन्दनक्रियाओं के प्रति वेग को असमवायिकारण माना जाता है, गुरुत्व को नहीं। पतन ठोस पदार्थों का होता है और स्यन्दन तरल पदार्थों का। [14. स्नेहस्य किं लक्षणं, कति विधश्च सः 1] चूर्णादिपिण्डीभावहेतुर्गणः स्नेहः / जलमात्रवृत्तिः।। ___ अनुवाद-[१४. स्नेह का क्या लक्षण है, और वह कितने प्रकार का है ? ] चूर्ण आदि के पिण्डीभाव (घनिष्ठता संयोगविशेष) में निमित्तकारणभूत गुण को स्नेह (चिकनाहट ) कहते हैं। वह केवल जल में रहता है। व्याख्या-जिस गुण से आटा आदि गोली का रूप धारण करते हैं उसे स्नेह कहते हैं। तेल, दूध तथा अन्य पार्थिव पदार्थों में जो स्निग्धता है वह जलीय तत्त्व के कारण है। बिना स्नेह के माने केवल द्रवत्व से पिण्डीभाव का कार्य नहीं होगा क्योंकि पिघले हुए स्वर्ण में द्रवत्व होने पर भी बह चर्णादि के पिण्डीभाव को नहीं करता है / अतः स्नेह का मानना जरूरी है। [15 शब्दस्य किं लक्षणं, कतिविधश्च सः?] श्रोत्रग्राह्यो गुणः शब्दः। आकाशमात्रवृत्तिः। स द्विविधो ध्वन्यात्मको
SR No.035324
Book TitleTark Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherSiddha Saraswati Prakashan
Publication Year
Total Pages65
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size38 MB
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