SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 93
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 128 देव, शास्त्र और गुरु प्रथम परिशिष्ट : प्रसिद्ध दि. जैन शास्त्रकार आचार्य और शास्त्र 129 शास्त्रकार-आचार्य शास्त्र समय, परिचयादि देवसेन अमितगति (प्रथम) अमितगति (द्वितीय) शाखकार-आचार्य शाख समय, परिचयादि एलाचार्य ई.८-९वीं शताब्दी। वीरसेन (धवला, जयधवला टीकाकार) के विद्यागुरु थे। वीरसेन के समकालीन या कुछ पूर्ववर्ती। सिद्धान्तशाख मर्मज्ञ थे। वीरसेन धवला ई. सन् 816 / एलाचार्य के शिष्य जिनसेन (षट्खण्डागम प्रथम ने अपने हरिवंशपुराण में इन्हें 'कविटीका), चक्रवर्ती लिखा है। गणित, न्याय, ज्योतिष, जयधवला व्याकरण आदि के ज्ञाता थे। भट्टारकपदवी(कषायपाहुड धारक तथा केवली के समान समस्त विद्याओं के टीका। बीस हजार पारगामी। टीकायें प्राकृत-संस्कृत-मिश्रित भाषा श्लोकप्रमाण मात्र) में हैं। जयधवला 20 हजार श्लोक प्रमाण तक ही लिख पाए पश्चात् मृत्यु होने पर जिनसेन द्वितीय ने उसे पूरा किया। जिनसेन द्वितीय पार्श्वभ्युदय ई. सन् नौवीं शती। इन्होंने वीरसेन की (समस्यापूर्तिकाव्य), जयधवलाटीका को पूरा किया और इनके आदिपुराण आदिपुराण को (इनकी मृत्यु हो जाने पर) इनके (42 पर्व तक), शिष्य गुणभद्र ने शेष 5 पर्व और लिखकर जयधवला टीका पूरा किया। सम्पूर्ण रचना महापुराण के नाम से (बीस हजार __ प्रसिद्ध है। प्रबुद्धाचार्य गुणभद्र (ई. 10 शताब्दी) श्लोक प्रमाण की रचना को उत्तरपुराण कहते हैं। के बाद) विद्यानन्द आप्तपरीक्षा (सवृत्ति), ई. सन् नौवीं शताब्दी। दक्षिण भारत के कर्नाटक प्रमाणपरीक्षा, प्रान्त के निवासी थे। इनके सभी ग्रन्थ दर्शनशास्त्र पत्रपरीक्षा, के प्रामाणिक तथा प्रौढ़ ग्रन्थ हैं। अंतिम सत्यशासन परीक्षा, तीन रचनायें क्रमशः निम्न ग्रन्थों की टीकायें हैंविद्यानन्द महोदय, तत्त्वार्थसूत्र, आप्तमीमांसा, युक्त्यनुशासनस्तोत्र। श्रीपुरपार्श्वनाथस्तोत्र, राजाबलीकथे में जिस विद्यानन्दि का जीवनवृत्त तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आया है वे इनसे भित्र परम्परापोषकाचार्य हैं। प्रौढ़ पाण्डित्य था। किंवदन्तियों के अनुसार इनका अष्टसहस्री जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनकी अष्टसहस्री (देवागमालङ्कार), जैनन्याय में अद्भुत ग्रन्थ है। इसे कष्टसहस्री भी युक्त्यनुशासनालङ्कार कहा है। दर्शनसार, वि.सं. 990-1012 / भावसंग्रह इनकी रचना भावसंग्रह, है या नहीं, मतभेद है। आलापपद्धति संस्कृतगद्यमयी आराधनासार, रचना है, शेष रचनायें प्राकृत में है। दर्शनतत्त्वसार, सार में इन्हें देवसेनगणि, तत्त्वसार में मुनिनाथ लघुनयचक्र, देवसेन तथा आराधनासार में देवसेन लिखा है। आलापपद्धति योगसारप्राभृत वि. सं. 1000 / ये नेमिषेण के गुरु और देवसेन के शिष्य थे। सुभाषितरत्नसंदोह, वि. सं. 12 वीं शताब्दी। माधुरसंघ के आचार्य। धर्मपरीक्षा, ये माधवसेन के शिष्य तथा नेमिषेण के प्रशिष्य उपासकाचार, हैं। धर्मपरीक्षा संस्कृत में व्यङ्ग्यप्रधान उत्कृष्ट (अमितगति- रचना है। अन्य रचनायें- लघु एवं बृहत् श्रावकाचार), सामायिक पाठ, जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति, सार्द्धद्वयद्वीपपञ्चसंग्रह (संस्कृत), प्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति ,व्याख्याप्रज्ञप्ति, आराधना प्राकृतपंचसंग्रह, और भावना-द्वात्रिंशतिका। आदि पुरुषार्थसिद्धयपाय ई.सन् १०वीं शती। पट्टावली में इनके पट्टारोहण (श्रावकाचार), का समय वि. सं. 962 दिया है। पं. आशाधर तत्त्वार्थसार, जी (वि. सं. 1300) ने आपका उल्लेख किया समयसारकलश, है। कुन्दकुन्दाचार्य के ग्रन्थों का रहस्य इनकी समयसारटीका व्याख्या के विना जानना कठिन था। ये मूल संघ (आत्मख्याति), के आचार्य थे और आध्यात्मिक विद्वान् थे। प्रवचनसारटीका टीकाकारों में आपका वही स्थान है जो कालिदास (तत्त्वप्रदीपिका) कवि के टीकाकार मल्लिनाथ का है। विद्वत्ता पंचास्तिकायटीका अद्भुत थी। (तत्त्वदीपिका) अमृतचन्द्रसूरि (सभाष्य),
SR No.035321
Book TitleDev Shastra Aur Guru
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherAkhil Bharatvarshiya Digambar Jain Vidwat Parishad
Publication Year1994
Total Pages101
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size61 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy