SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 377
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( ३५६ ) था । तेरा पिता तो तुझै वनसे लेआया, राजा बनानेके लिये सानंद तेरा पालनपोषण किया था । यदि तेरा पिता ऐसा काम न करता तो तुझै राज्य क्यों देता ? पुत्र, तेरे पिताका तुझमें बड़ा स्नेह बड़ा मोह और बड़ी भारी प्रीति थी। तुझसे वे अनेक आशा भी रखते थे इसमें जराभी झूठ नहिं । जैसी वेदनां इससमय तू अपने पिताको दे रहा है 'याद रख ' | तेरा पुत्र भी तझै वेसी ही वेदना देगा । खेतमें जैसा बीज बोया जाता है वैसा ही फल.काटा जाता है उसी प्रकार जैसा काम किया जाता है फलभी उसीके अनुसार भोगना पड़ता है। राजन् ! जिसने तुझै राज्य दिया, जन्म दिया और विशेषतया पढ़ा लिखाकर तैयार किया, क्या उस पूज्यपादके साथ तेरा यह क्रूर वर्ताव प्रशंसनीय हो सकता है ? अरे ! जो मनुष्य उत्तम हैं वे अपने पिताकी पूज्य समझ भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं । पितासे भी अधिक राज्य देनेवालेको और उससे भी अधिक विद्या प्रदान करनेवालेको पूजते है । तू यह निकृष्ट काम क्या कररहा है ? जो उपकारका आदर करनेवाला है सज्जन लोग जब उसका भी उपकार करते हैं तो उपकार करनेवालेका तो वे अवश्य ही उपकार करते हैं । जो मनुष्य पर उपकारको नहिं मानते हैं वे नराधम कहलाते हैं और वे नियमसे नर्क जाते हैं । राजन् ! जो किये उपकारका लोप करनेवाले हैं वे संसारमें कृतघ्न कहलाते हैं। किंतु जो कृत उपकारको Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy