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________________ ( २३३ ) कर शीघ्र मेरे इस संशयको दूर करें । राजाके ऐस वचन सुन मुनिवर धर्मघोषने कहा : राजन् जब हम राजमंदिरमें आहारार्थ पहुंचे थे। हमें देख रानी चेलनाने यह कहा था हे त्रिगुप्तिपालक मुनिगज ! आप मेरे राजमंदिरमें आहारार्थ विराजै । हम त्रिगुप्तिपालक थे नहिं इसलिये हम वहां न ठहरे । हमारे न ठहरनेका और दूसरा कोई कारण न था। मुनिराजके एसे वचन सुन महाराज आश्चर्य सागरमें गोता मारने लगे। वे सोचने लगे ये परम पवित्र मुनिराज किस गुप्ति के पालक नहीं हैं ? तथा ऐसा कुछ समय सोच विचार कर महाराजने शीघ्र ही मुनिराजसे निवेदन किया-- कृपानाथ ! क्या आपके तीनों ही गुप्ति नहीं हैं। अथवा कोई एक नहीं है। तथा वह क्यों नहीं है ? कृपया शीघ्र कहैं महाराज श्रेणिकके ऐसे लालसा युक्त वचन सुनकर मुनिराजने कहा राजन् ! हमारे मनोगुप्ति नहीं है। वह क्यों नहीं है उसका कारण कहता हूं आप ध्यान पूर्वक सुनें। ____ अनक प्रकारके उत्तमोत्तम नगरोंसे व्याप्त इसी जंबूद्वीपमें एक कालंग नामका देश है । कलिंग देशमें अतिशय मनोहर बाजारोंकी श्रेणियोंसे व्याप्त एक दंतपर नामका सर्वोत्तम नगर है । दंतपुरका स्वामी जोकि नीति पूर्वक प्रजाका पालक मंत्री एवं बड़े २ सामंतोंसे बेष्टित, सूर्यके समान प्रतापी था Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035265
Book TitleShrenik Charitra Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGajadhar Nyayashastri
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1914
Total Pages402
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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