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( १९९ ) मातः! तूं इस बातकेलिये जरा भी खेद मत कर। यदितूं नहीं मानती है तो मैं अपना सारा हाल तुझे सुनाती हूं। तू ध्यानपूर्वक सुन-मेरे शयनागरमें एक संदूक रक्खी रहती है। जिससमय दिन हो जाता है उससमय तो मेरा पति नाग बन जाता है । और दिनभर नागरूपमें मेरे साथ खेल किलोल करता है । और जब रात हो जाती है तो वह उस. संदूकसे निकल उत्तम मनुष्याकार बन जाता है । एवं मनुष्यरूपसे रात भर मेरे साथ भोग भोगता है। पुत्रीके मुखसे यह विचित्र घटना सुन सागरदत्ता आश्चर्य करने लगी उसने शीघ्र ही नागदत्तासे कहा____नागदत्ते ! यदि यह बात सत्य है तो तू एक काम कर उस संदूकको तू किसी परिचित एवं अपने अभीष्ट स्थानमें रख । और यह वृत्तांत मुझे दिखा । तब मैं तेरी बात मानूंगी
पुत्री नागदत्ताने अपनी माताकी आज्ञा स्वीकार करली। तथा किसी निश्चितदिन नागदत्ताने उस संदूकको ऐसे स्थान पर रखवा दिया जो स्थान उसकी माका भी : भलेप्रकार परि चित था। और माको इशारा कर वह मनुष्याकार अपने पति के साथ भोग भोगने लगी। . ..
वस फिर क्या था ? हे महाराज! जिससमय सागरदत्ताने उस संदूकको खुला देखा, तो उसने उसे खोखला, समझ शीघ्र जला दिया । और वह वसुभित्र फिर सदाके
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