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________________ श्रावक के चार शिक्षा व्रत ५६ १० मुम्मन-सामायिक के पाठ आदि का स्पष्ट उच्चारण न करना किन्तु गुनगुन बोलना 'मुम्मन' दोष है । ये दस दोष वचन सन्बन्धी हैं। इन दस दोषों से बचना वचन शुद्धि है। कुआसणं चलासणं चलादिट्ठो, सावज्ज किरिया लंबणा कुंचण पसारणं । आलस्समोडन मलविणासणं, निदा वेयावञ्चति बारस काय दोसा ॥ १ आसन-कुआसन बैठना जैसे पाँव पर पाँव चढ़ा कर आदि 'कुआसन' दोष है। २ चलासन-स्थिर आसन न बैठ कर बार-बार आसन बदलना, 'चलासन' दोष है । ३ चल दृष्टि-दृष्टि को स्थिर न रखना, बार-बार इधर उधर देखना 'चल दृष्टि दोष है। ४ सावध क्रिया-शरीर से सावद्य क्रिया करना, इशारा करना या घर की रखवाली करना, 'सावध क्रिया' दोष है। ५ आलम्बन-बिना किसी कारण के दीवाल आदि का सहारा लेकर बैठना, 'श्रालम्बन' दोष है। ६ अकुंचन पसारन-बिना प्रयोजन ही हाथ पाँव फैलाना समेटना, 'कुंचन पसारन' दोष है । Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035262
Book TitleShravak Ke Char Shiksha Vrat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchand Shreeshrimal
PublisherSadhumargi Jain
Publication Year1941
Total Pages164
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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