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________________ श्रावक के चार शिक्षा व्रत ५२ क्षेत्र-शुद्धि है। आत्मा को उच्च दशा में पहुँचाने वाले साधनों में क्षेत्र शुद्धि भी एक है। ३ काल शुद्धि - काल से मतलब है समय । समय का विचार रखकर जो सामायिक की जाती है, वह सामायिक निर्विघ्न और शुद्ध होती है। समय का विचार न रखकर सामायिक करके बैठने पर, सामायिक में अनेक प्रकार के संकल्प विकल्प होते हैं और चित्त शान्त नहीं रहता है । इसलिए सामायिक का काल भी शुद्ध होना चाहिए | ४ भाव शुद्धि - भाव शुद्धि से मतलब है मन, वचन श्रीर काय की एकाग्रता । मन, वचन, काय के योग की एकामता जिन दोषों से नष्ट होती है, उन दोषों का त्याग करना, भाव शुद्धि है । भाव शुद्धि के लिए उन दोषों को जानना और उनसे बचना आवश्यक है जो दोष मन, वचन, काय के योग की एकाग्रता भंग करते हैं । इन चारों तरह की शुद्धि के साथ हो सामायिक बत्तीस दोषों से रहित होनी चाहिए । किन कार्यों से सामायिक दूषित होती है और कौन से दोष सामायिक का महत्व घटाते हैं यह नीचे बताया जाता है । अविवेक जस्सो कित्ती लाभत्थी गव्व भय नियाणत्थो । संसय रोस अविणउ अबहुमाणप दोसा भणियव्वा ॥ १ अविवेक - सामायिक के सम्बन्ध में विवेक न रखना, Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035262
Book TitleShravak Ke Char Shiksha Vrat
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalchand Shreeshrimal
PublisherSadhumargi Jain
Publication Year1941
Total Pages164
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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