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________________ शिक्षण और चरित्र-निर्माख ( लेखक - मुनिराज श्री विद्याविजय जी, शिवपुरी ) । मानव जाति के साथ शिक्षण का सम्बन्ध हमेशा से चला आया है । कोई ऐसा समय नहीं था, जबकि मनुष्य को शिक्षण न दिया जाता हो । संसार परिवर्तनशील है, इसलिए शिक्षण की पठन-पाठन प्रणाली में, एवं पाठ्यक्रम तथा अन्यान्य साधनों में परिवर्तन अवश्य होता रहा है । किन्तु शिक्षण, यह तो अनिवार्य वस्तु बनी रही है । " आवश्यकता आविष्कार की जननी है" । जिस-जिस समय जिस चीज की आवश्यकता उत्पन्न होती है, उस समय उस चीज की उत्पत्ति अनायास हो ही जाती है । " कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति नहीं होती" । किसी भी देश में, किसी भी समाज में बल्कि किसी भी कुटुम्ब और व्यक्ति में भी, जो-जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, वे सब सहेतुक ही हुआ करती हैं। शिक्षण, एक या दूसरी रीति से सभी देशों, समाजों और व्यक्तियों में हुआ, होता आया और हो रहा है । किन्तु जैसे उसके तरीकों Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035259
Book TitleShikshan Aur Charitra Nirman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Granthmala
Publication Year1951
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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