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________________ । संख्या २] . . सदा कुंवारे टीकमलाल जो अब तक पूरा नहीं हुआ था, और वह था पुत्र लेकिन अाखिर वह लाचार हो गई । अब तक मनोका जन्म। बल से जिस देह को वह घिस रही थी, मनोबल के रहते ... और, यह शुभ समय भी कुछ देर के लिए निकट भी अब उसने उठने से इनकार कर दिया । हीरा ने बिछौना आता-सा. दिखाई पड़ा; श्राशालता एकबारगी लहलहा पकड़ लिया । उठी। मगर दुर्भाग्य था कि बेटे की जगह बेटी आ गई ! - टीकम ने और उसकी मा ने पहले तो बड़े चाव से घरवालों ने यह सोचकर मन को दिलासा दी कि 'अाज हीरा की चाकरी शुरू की। लेकिन जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती लड़की आई है तो कल लड़का भी आयगा।' गई और दिन बीतते गये, हीरा के अच्छे होने की उम्मीद और हीरा बहू की क्या तारीफ़ की जाय ? वह एक कम होती गई । टीकम की हालत बड़ी दयनीय हो गई थी। ही गुण वती थी। जब उस बार टीकम बहुत बीमार पड़ा तब मर्द अादमी था। काम-धन्धा छोड़कर बीमार औरत के हीरा ही थी, जो दिन-रात एक पैर पर खड़ी चाकरी करती पीछे कब तक बैठा रहता ? और मा बेचारी क्या करे ? रही। उसकी वह सेवा, वह टहल और वह साधना, जिसने बुढ़ापे में भगवान् का नाम लेकर अात्मा का उद्धार करे या देखी है वही उसकी कदर कर सकता है। उसकी याद सारी ज़िन्दगी बेटे की और उसके संसार की गुलामी में आते ही आज के इस मंगल-अवसर पर भी टीकम की गिरफ्तार रहे ? अगर रहना भी चाहे तो बुढ़ापे की देह आँखें भीगे बिना न रहीं। भला कब तक साथ दे? । कोई एक बरस बाद हीरा सौभाग्य से फिर दुसाध हीरा को बीमार रहते दो-दो साल बीत गये। दिनों हुई । टीकम की बीमारी में वह काफ़ी दुबली हो गई थी, · दिन उसकी देह छीजती गई । वैद्यों ने और डाक्टरों ने तो इसलिए ये नौ महीने ज़रा संकट में ही बीते । लेकिन जब बहुत पहले से उसकी अाशा छोड़ रक्खी थी, मगर जीवन नवें महीने टीकम के घर पचीस बरस में पहली बार पुत्र की डोरी जरा लम्बी थी, और उसकी अाश पर साँस टिकी ने अवतार लिया तब क्या सास, क्या बहू और क्या पति, थी। वही मसल थी कि चङ्गा खाये धान, और बीमार तीनों के अानन्द का पार न रहा, तीनों गद्गद हो उठे। खाये धन । हीरा की बीमारी में काफ़ी पैसा खर्च हो टीकम के लिए जीवन के सुख की यह चरम सीमा थी। रहा था। टीकम के लिए यह एक सवाल था कि वह पितरों को स्वर्ग पहुँचाने का जो महान् उत्तरदायित्व उसके कब तक मौत के किनारे बैठी हुई इस औरत के पीछे माथे था उसे अाज सफल होते देख वह कृतार्थ होगया था। अपनी गाढ़ी कमाई ख़रचता रहे। आखिर धीरज छूट लेकिन विधना से बढ़कर ईर्ष्यालु शायद ही दूसरा कोई गया, और लोग मनाने लगे कि भगवान् ! जल्दी से इस हो ! उसे किसी का सुख नहीं सुहाता । अतृप्त लालसाओं पीड़ा से छुड़ानो, और हमें भी हलका करो। लेकिन राम को लेकर जो बिजली चली गई थी, इस समय वही प्रेत रक्खे तो कौन चक्खे ? काँच की प्याली तो थी नहीं कि बनकर हीरा बहू के सुख में राहु बनकर आई। जब अपने पटकी और चूर-चूर हुई ! एक महीने के लाल को लेकर हीरा पहली बार पति के घर गई. आख़िर महीनों और बरसों की प्रतीक्षा के बाद बिदाई तब कहीं से आकर उस प्रेतिनी ने हीरा को छला। हीरा काँप का वह दिन भी आ ही पहुँचा । हीरा सँभल गई। टीकम को उठी। मारे डर के उसी रात उसे धड़धड़ा कर ज़ोरों का अपने पास बुलाया और विनय-भरे स्वर में बोली-नाथ ! बुख़ार हो अाया, और कुछ ही दिनों के बाद उसे क्षय हो गया! मैं जानती हूँ, मैंने आपको बहुत दुःख दिया है। मुझसे । खटिया पर पड़े-पड़े भी हीरा, बीमारी की हालत में, आपकी कोई सेवा बन नहीं पाई । परमात्मा से मैं यही चाहूँगी. अपने पति और पुत्र का काम करती रहती थी। बीमारी का कि जब जन्D , आप ही को पाऊँ । थकावट के कारण कुछ क्या, कल मिट सकती है; घर का काम कौन करे ? बूढ़ी देर चुप रहकर वह फिर बोली-प्यारे ! मेरे बाद कौन है, १ सास थी; वह अगर देव-दर्शन को न जाती तो उसका जो आपकी चिन्ता करेगा, बच्चों की सार-सँभाल रक्खेगा ? बुढ़ापा बिगड़ता ! और हीरा पतिव्रता ठहरी । वह भला मुझे इसकी बड़ी फ़िक्र है। मा जी तो अब थक गई हैं। क्यों यह अन्याय अपनी आँखों देखती ? कहती हूँ, मेरी एक बात मान लो, मुझे वचन दे दो, में Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035249
Book TitleSaraswati 1937 01 to 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevidutta Shukla, Shreenath Sinh
PublisherIndian Press Limited
Publication Year1937
Total Pages640
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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