SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 150
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ १२८ ] संक्षिप्त जैन इतिहास | उनके साथ इस ग्रन्थमें बुटुग, मारसिंह चन्त्रकेतन वंशके शंकरगंड आदि राजाओंका भी उल्लेख हुआ है । " महाकवि रन्नके आश्रयदाता गंग-सेनापति चावुंडराय भी स्वयं एक कवि थे. और उन्होंने 'चावुंडराय अन्य कविगण | पुराण' की रचना की थी, यह पहले लिखा जा चुका है। कवि रन्नके सहपाठी श्री नेमिचन्द्र कवि थे, जिन्होंने 'कविराज - कुंजर' और 'लीलावती' नामक ग्रंथ रचे थे । ' लीलावती' शृङ्गारसका एक सुन्दर काव्य है । यह I महानुभाव तैल- नृपके गुरु थे । सन् ९८४ के लगभग कवि नागवर्मने 'छन्दोम्बुधि' ग्रंथकी रचना की थी; जो बाज भी कन्नड छन्दशास्त्रपर एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है । कविने यह ग्रन्थ अपनी पत्नीको लक्ष्य करके लिखा है । इन्होंने संस्कृत भाषाके कवि बाण कृत कादम्बरी' का अनुवाद भी कनड़ी भाषामें किया था । नागवर्मके पूर्वज भी बेङ्गी देश के निवासी थे। किंतु स्वयं उनके विषय में कहा गया है कि वह सय्यदि नामक ग्राममें रहते थे, जो किसुकाडु नाडमें अवस्थित थे । उन्होंने स्वयं लिखा है कि वह नृप रक्कम गंगके आधीन साहित्यरचना करते थे । चावुंडरायने उनको भी आश्रय दिया था । अजितसेनाचार्य उनके गुरु थे । इस प्रकार इन श्रेष्ठ कवियों द्वारा तत्कालीन कन्नड़ साहित्य खूब समुझत मा था । 1 १-०, पृष्ठ २०८-२७९ व अनेकांत भाग १ पृ० ४४. २० पृ० ३३ व ग० पृ० २७९ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035246
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 03 Khand 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1938
Total Pages192
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy