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________________ संलित जैन इतिहास । दिन 'ज्ञान' मूर्तिमान हो उनके मभ्यन्तरमें नाचने लगा। पार्श्वनाथ साक्षात् भगवान् होगये-वे अब सर्वज्ञ तीर्थकर थे। ज्ञान-प्रकाशका धवल मालोक उनके चहुंओर छिटक रहा था। ज्ञानी जीव उनकी सरणमें पहुंचे। भगवान ने उन्हें सच्चा धर्म बताया, जिसे पाकर सब ही जीव सुखी हुये-सबने समानताका अनुभव किया और मात्मस्वातंव्यके वे अधिकारी हुये । . अपने इस विश्वसन्देशको लेकर भगवान पार्श्वनाथने सारे मार्यदेशमें विहार किया। जहां-जहां उनका शुभागमन हुआ वहां वहांके लोग प्रतिबुद्ध हो सन्मार्ग पर आरूढ़ हुये । भगवान पार्श्वनाथके धर्मप्रचारका वर्णन सकलकीर्ति कृत 'पार्श्वनाथचरित्' में निम्नप्रकार लिखा हुभा है: "तत्व मेदप्रदानेन श्रीमत्पाश्वभुमहान् । जनान कौशलदेशीयान् कुशलान् संध्यध्यभृशं ॥ ७६ ॥ भिदन् मिथ्यातमोगाढं दिव्यध्वनिप्रदीपकैः । काशीदेशीयकोकान् स चक्रे संयमतत्परान् ।। ७७ ॥ श्रीमन्माळवदेशीयभव्यलोकसुचातकान् । देशनारसधाराभिः प्रीणयामास तीर्थराट् ।। ७८ ॥ अतीयान् जनान् सर्वान् मिथ्यात्वानलतापितान् । रयान्निपियामास...पार्श्वचन्द्रामृतैः ॥ ७९ ॥ गोजराणां जनानां हि पार्श्वसम्राट् जितेंद्रियः । मिथ्यात्वं जनरं चक्रे सद्वचः शस्त्रधातनैः ॥ ८ ॥ महाबतपरान् काश्चिन्महाराष्ट्रजनान्ध्यवान् । दीक्षोपदेशदानेन पार्थकल्पद्रुमस्तथा ॥ ८ ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.035245
Book TitleSankshipta Jain Itihas Part 03 Khand 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamtaprasad Jain
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1937
Total Pages174
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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